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अटकी पतंग हूँ!
माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा,तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ। सूर्यभानु गुप्त
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निकला हूँ इक नदी सा
निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने,कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ। सूर्यभानु गुप्त
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अँधेरी सुरंग हूँ!
रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ,मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ। सूर्यभानु गुप्त
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मोहरा सियासतों का!
मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी,मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ। सूर्यभानु गुप्त
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हर लम्हा ज़िन्दगी के!
हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ,मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ। सूर्यभानु गुप्त
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संगतकार!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मंगलेश जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की यह कविता – मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देतीवह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई…