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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th May 2025

    बाजरे की फ़सल!

    तेरे गहनों सी खनखनाती थी,बाजरे की फ़सल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    एक शमअ-सी!

    सोचता हूँ कि बंद कमरे में,एक शमअ-सी जल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    कल का सपना!

    कल का सपना बहुत सुहाना था,ये उदासी न कल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    वो पिघल रही होगी!

    फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा,बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    चांदनी छत पे चल रही

    चांदनी छत पे चल रही होगी,अब अकेली टहल रही होगी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    यहाँ टूटे हुए पर!

    किसी संवेदना के काम आएँगे,यहाँ टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    ये मूरत बोल सकती!

    ये मूरत बोल सकती है अगर चाहो,अगर कुछ बोल कुछ स्वर फेंक दो तुम भी। दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2025

    पाव भर कद्दू से रायता!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यास एवं कहानी लेखिका और कवियित्री  सुश्री ममता कालिया जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी एक रचना मैंने पहले भी शेयर की हैं।   लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री ममता कालिया जी की यह कविता – एक नदी की तरहसीख गई है घरेलू औरतदोनों हाथों में बर्तन…

  • 5th May 2025

    बहाने याद कर लेंगे!

    तुम्हें भी इस बहाने याद कर लेंगे,इधर दो—चार पत्थर फेंक दो तुम भी। दुष्यंत कुमार

  • 5th May 2025

    सपने जी नहीं पाते!

    यहाँ मासूम सपने जी नहीं पाते,इन्हें कुंकुम लगा कर फेंक दो तुम भी। दुष्यंत कुमा

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