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सीढ़ियाँ उतरने में!
दस्तकें भी देने पर दर अगर न खुलता हो, सीढ़ियाँ उतरने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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दर्द की कहानी को!
दर्द की कहानी को इश्क़ के फ़साने को, दास्तान बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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हादिसा भी होने में!
हादिसा भी होने में वक़्त कुछ तो लेता है, बख़्त के बिगड़ने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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आँख से न हटना तुम!
आँख से न हटना तुम आँख के झपकने तक,आँख के झपकने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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दूरियाँ सिमटने में!
दूरियाँ सिमटने में देर कुछ तो लगती है,रंजिशों के मिटने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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उतना तुम पर विश्वास बढ़ा!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रामेश्वर शुक्ल अंचल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामेश्वर शुक्ल अंचल जी की यह कविता – बाहर के आँधी पानी से मन का तूफ़ान कहीं बढ़ कर,बाहर के सब आघातों…
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वो बेवफ़ा अच्छा लगा!
इस अदू-ए-जाँ को ‘अमजद‘ मैं बुरा कैसे कहूँ, जब भी आया सामने वो बेवफ़ा अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद