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जैसी गुज़र गई!
कुछ दिन की और कश्मकश-ए-ज़ीस्त है ‘असर’,अच्छी बुरी गुज़रनी थी जैसी गुज़र गई| असर लखनवी
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मल के भभूत चेहरे पे!
मल के भभूत चेहरे पे तारों की छाँव का,धोनी रमाए दर पे ये किस के सहर गई| असर लखनवी
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अग्निबीज!
एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवि बाबा नागार्जुन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नागार्जुन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नागार्जुन जी की यह कविता– अग्निबीजतुमने बोए थेरमे जूझते,युग के बहु आयामीसपनों में, प्रियखोए थे !अग्निबीजतुमने बोए थे तब के वे…
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क़ीमत और बढ़ती है!
अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक्सर,न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है| नवाज़ देवबंदी