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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Jul 2025

    जैसी गुज़र गई!

    कुछ दिन की और कश्मकश-ए-ज़ीस्त है ‘असर’,अच्छी बुरी गुज़रनी थी जैसी गुज़र गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    कहने की बात!

    अब हाथ मलते हैं कि दम-ए-अर्ज़-ए-माजरा,कहने की बात ध्यान से कैसी उतर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    सीने में और ताब दे!

    सीने में और ताब दे शोले को शौक़ के,सज्दा ग़लत अगर न तजल्ली निखर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    फूलों की गोद!

    क्या जाने आँख मार के क्या कह गई शफ़क़,फूलों की गोद मौज-ए-नसीम आ के भर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    मल के भभूत चेहरे पे!

    मल के भभूत चेहरे पे तारों की छाँव का,धोनी रमाए दर पे ये किस के सहर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    किरन आफ़्ताब की!

    पेश-ए-जमाल-ए-यार किरन आफ़्ताब की,शर्मा के चाहती थी कि पलटे बिखर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    खिली और सँवर गई!

    मश्शाता-ए-बहार अजब गुल कतर गई,मुँह-बंद जो कली थी खिली और सँवर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    इधर आई उधर गई!

    झपकी ज़रा जो आँख जवानी गुज़र गई,बदली की छाँव थी इधर आई उधर गई| असर लखनवी

  • 24th Jul 2025

    अग्निबीज!

    एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवि बाबा नागार्जुन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नागार्जुन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नागार्जुन जी की यह कविता– अग्निबीजतुमने बोए थेरमे जूझते,युग के बहु आयामीसपनों में, प्रियखोए थे !अग्निबीजतुमने बोए थे तब के वे…

  • 23rd Jul 2025

    क़ीमत और बढ़ती है!

    अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक्सर,न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है| नवाज़ देवबंदी

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