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सुर की गति मैं क्या जानूं!
आज फिर से मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ संत सूरदास जी का यह भजन जो मुकेश जी ने गाया है- सुर की गति मैं क्या जानूं, एक भजन करना जानूं आशा है आपको यह पसंद आएगा। धन्यवाद
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मोहब्बत बोझ बन!
मोहब्बत बोझ बन कर ही भले रहती हो काँधों पर,मगर ये बोझ हटता है तो काँधे टूट जाते हैं| वसीम नादिर
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शिखर से शिखर तक!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि, कथाकार एवं उपन्यासकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – 1. मंच पर उपस्थित एक लेखक के बारे मेंदूसरे लेखक ने कहा-ये…
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सलीक़े से अगर तोड़ें !
सलीक़े से अगर तोड़ें तो काँटे टूट जाते है,मगर अफ़्सोस ये है फूल पहले टूट जाते है| वसीम नादिर
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वो चेहरा बदलता है!
अजब ज़िद्दी मुसव्विर है ज़रा पहचान की ख़ातिर,मिरी तस्वीर का हर रोज़ वो चेहरा बदलता है| वसीम नादिर
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आईना बदलता है!
मिरी आँखों को पहली आख़िरी हद है तिरा चेहरा,नहीं मैं वो नहीं जो रोज़ आईना बदलता है| वसीम नादिर
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पिंजरा बदलता है!
रिहाई मिल तो जाती है परिंदे को मगर इतनी,सफ़ाई की ग़रज़ से जब कभी पिंजरा बदलता है| वसीम नादिर
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जनाज़ा अपनी मर्ज़ी!
तुम्हारे बाद अब जिस का भी जी चाहे मुझे रख ले,जनाज़ा अपनी मर्ज़ी से कहाँ कांधा बदलता है| वसीम नादिर
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मगर इन कोशिशों से!
कभी कपड़े बदलता है कभी लहजा बदलता है,मगर इन कोशिशों से क्या कहीं शजरा* बदलता है|*वंशावली वसीम नादिर
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फिर ख़बर रिहाई की!
फिर क़फ़स में शोर उट्ठा क़ैदियों का और सय्याद,देखना उड़ा देगा फिर ख़बर रिहाई की| अहमद फ़राज़