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ये पसीना वही आँसू हैं!
ये पसीना वही आँसू हैं जो पी जाते थे हम,‘आरज़ू’ लो वो खुला भेद वो टूटा पानी| आरज़ू लखनवी
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ये हवा करती है!
न सता उस को जो चुप रह के भरे ठंडी साँस,ये हवा करती है पत्थर का कलेजा पानी| आरज़ू लखनवी
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टिकटिकी बाँधे वो!
टिकटिकी बाँधे वो तकते हैं मैं इस घात में हूँ,कहीं खाने लगे चक्कर न ये ठहरा पानी| आरज़ू लखनवी
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जब हम दोनो ज़ुदा हुए!
आज एक पुरानी पोस्ट दोहराने का दिन है। आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- हम दोनो जब ज़ुदा हुएखामोशी और आंसुओं के बीच,टूटे हुए दिल के साथ,बरसों…
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चाह में पाऊँ कहाँ!
चाह में पाऊँ कहाँ आस का मीठा पानी,प्यास भड़की हुई है और नहीं मिलता पानी| आरज़ू लखनवी