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अन-देखा हुआ देखें!
बहुत मुद्दत हुई ये आरज़ू करते हुए हम को,कभी मंज़र कहीं हम कोई अन-देखा हुआ देखें| शहरयार
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भरी दुपहरी!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि, नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – भरी दुपहरीमारी-मारी फिरे डाल परपतछाँही के लिए गिलहरीभरी दुपहरी । उलटी धूपघड़ी की टिड्डीचाट…
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याद भी आते नहीं!
क्या क़यामत है ‘मुनीर’ अब याद भी आते नहीं,वो पुराने आश्ना जिन से हमें उल्फ़त भी थी| मुनीर नियाज़ी
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अजनबी शहरों में!
अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई,गो ज़रा से फ़ासले पर घर की हर राहत भी थी| मुनीर नियाज़ी
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कुछ मिरी हिम्मत भी!
कह गया मैं सामने उस के जो दिल का मुद्दआ’,कुछ तो मौसम भी अजब था कुछ मिरी हिम्मत भी थी| मुनीर नियाज़ी
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जो हवा में घर बनाए!
जो हवा में घर बनाए काश कोई देखता,दश्त में रहते थे पर ता’मीर की आदत भी थी| मुनीर नियाज़ी
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चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!
आपकी सेवा में अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज एक बार फिर मैं एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे लिखा था ज़नाब अमजद इस्लाम अमजद जी ने और गाया था जगजीत सिंह जी ने, इसके बोल हैं – चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!लीजिए प्रस्तुत है ये ग़ज़ल धन्यवाद
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फूल थे बादल भी था!
फूल थे बादल भी था और वो हसीं सूरत भी थी,दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी| मुनीर नियाज़ी
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मौसम की बात करेंगे!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- विषय आज कुछ नहीं सूझताफिर मौसम की बात करेंगे। मौसम के हम नहीं नियंताअक्सर उसके मारे रहतेकभी किसी हद तक भाता वहकभी प्रभाव दुधारे रहते, लेकिन उसके बारे में हमकुछ तो तहकीकात करेंगे। वैसे यह भी नहीं रहा अबऊपर वाले की मर्जी भरकुछ माहौल बना…