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जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी-1
एक बार फिर से आज मैं, विख्यात हिंदी कवि स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की यह कविता– दीप, जिनमें स्नेहकन ढाले गए हैंवर्तिकाएँ बट बिसुध बाले…
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जिस पंछी की परवाजों में!
जिस पंछी की परवाजों में जोश-ए-जुनूँ भी शामिल हो,उस की ख़ातिर आब-ओ-दाना पहले भी था आज भी है| हस्तीमल हस्ती
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अपने दुख-सुख!
अपने दुख-सुख कह लेना कभी हँस लेना कभी रो लेना,तन्हाई से अपना याराना पहले भी था आज भी है| हस्तीमल हस्ती
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मेरे लबों पर तेरा!
रंग बदलती इस दुनिया में सब कुछ बदल गया लेकिन,मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है| हस्तीमल हस्ती
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तुझ से इक रिश्ता!
ख़्वाब में तेरा आना-जाना पहले भी था आज भी है,तुझ से इक रिश्ता अन-जाना पहले भी था आज भी है| हस्तीमल हस्ती
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ख़ुद चराग़ बन के!
ख़ुद चराग़ बन के जल वक़्त के अँधेरे में,भीक के उजालों से रौशनी नहीं होती| हस्तीमल हस्ती
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दोस्ती नहीं होती!
दोस्त पे करम करना और हिसाब भी रखना,कारोबार होता है दोस्ती नहीं होती| हस्तीमल हस्ती
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इतनी ख़ूबसूरत ये!
दिल में जो मोहब्बत की रौशनी नहीं होती,इतनी ख़ूबसूरत ये ज़िंदगी नहीं होती| हस्तीमल हस्ती