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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 31st Oct 2025

    अन-देखा हुआ देखें!

    बहुत मुद्दत हुई ये आरज़ू करते हुए हम को,कभी मंज़र कहीं हम कोई अन-देखा हुआ देखें| शहरयार

  • 31st Oct 2025

    भरी दुपहरी!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि, नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – भरी दुपहरीमारी-मारी फिरे डाल परपतछाँही के लिए गिलहरीभरी दुपहरी । उलटी धूपघड़ी की टिड्डीचाट…

  • 30th Oct 2025

    ये हसरत है कि!

    कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें,ये हसरत है कि इन आँखों से कुछ होता हुआ देखें| शहरयार

  • 30th Oct 2025

    याद भी आते नहीं!

    क्या क़यामत है ‘मुनीर’ अब याद भी आते नहीं,वो पुराने आश्ना जिन से हमें उल्फ़त भी थी| मुनीर नियाज़ी

  • 30th Oct 2025

    अजनबी शहरों में!

    अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई,गो ज़रा से फ़ासले पर घर की हर राहत भी थी| मुनीर नियाज़ी

  • 30th Oct 2025

    कुछ मिरी हिम्मत भी!

    कह गया मैं सामने उस के जो दिल का मुद्दआ’,कुछ तो मौसम भी अजब था कुछ मिरी हिम्मत भी थी| मुनीर नियाज़ी

  • 30th Oct 2025

    जो हवा में घर बनाए!

    जो हवा में घर बनाए काश कोई देखता,दश्त में रहते थे पर ता’मीर की आदत भी थी| मुनीर नियाज़ी

  • 30th Oct 2025

    चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!

    आपकी सेवा में अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज एक बार फिर मैं एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे लिखा था ज़नाब अमजद इस्लाम अमजद जी ने और गाया था जगजीत सिंह जी ने, इसके बोल हैं – चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले!लीजिए प्रस्तुत है ये ग़ज़ल धन्यवाद

  • 30th Oct 2025

    फूल थे बादल भी था!

    फूल थे बादल भी था और वो हसीं सूरत भी थी,दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी| मुनीर नियाज़ी

  • 30th Oct 2025

    मौसम की बात करेंगे!

    प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- विषय आज कुछ नहीं सूझताफिर मौसम की बात करेंगे। मौसम के हम नहीं नियंताअक्सर उसके मारे रहतेकभी किसी हद तक भाता वहकभी प्रभाव दुधारे रहते, लेकिन उसके बारे में हमकुछ तो तहकीकात करेंगे। वैसे यह भी नहीं रहा अबऊपर वाले की मर्जी भरकुछ माहौल बना…

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