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ख़ामोश हो गए हैं!
शायद ज़बाँ पे क़र्ज़ था हम ने चुका दिया,ख़ामोश हो गए हैं तुझे हम पुकार के| अजय सहाब
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क्यूँ है मिरी तलाश!
क्या जाने अब भी दर्द को क्यूँ है मिरी तलाश,टुकड़े भी अब कहाँ बचे इस के शिकार के| अजय सहाब
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कोई तो कारोबार हो!
दिल में हज़ार दर्द हों आँसू छुपा के रख,कोई तो कारोबार हो बिन इश्तिहार के| अजय सहाब
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जैसे पुराना हार था!
जैसे पुराना हार था रिश्ता तिरा मिरा,अच्छा किया जो रख दिया तू ने उतार के| अजय सहाब
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रातें थीं क़र्ज़ की!
हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के,रातें थीं क़र्ज़ की यहाँ दिन थे उधार के| अजय सहाब
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काले काले वो गेसू!
काले काले वो गेसू शिकन-दर-शिकन, वो तबस्सुम का आलम चमन-दर-चमन,खींच ली उन की तस्वीर दिल ने मिरे, अब वो दामन बचा कर किधर जाएँगे| राज़ इलाहाबादी
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गेसू बिखर जाएँगे!
ऐ नसीम-ए-सहर तुझ को उन की क़सम, उन से जा कर न कहना मिरा हाल-ए-ग़म, अपने मिटने का ग़म तो नहीं है मगर, डर ये है उन के गेसू बिखर जाएँगे| राज़ इलाहाबादी