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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Nov 2025

    इन पर किसी मौसम!

    इन पर किसी मौसम का असर क्यूँ नहीं होता, रद क्यूँ तिरी यादों की उड़ानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना

  • 3rd Nov 2025

    कोई ग़ज़ल-चेहरा!

    अब कोई ग़ज़ल-चेहरा दिखाई नहीं देता,अब शहर में अबरू की कमानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना

  • 3rd Nov 2025

    धागों बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में मेरे अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक श्रेष्ठ गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- नागफनी आंचल में बांध सको तब आना धागों बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं। आशा आपको यह पसंद आएगा धन्यवाद। *****

  • 3rd Nov 2025

    क्या मरते हुए लोग!

    क्या मरते हुए लोग ये इंसान नहीं हैं,क्या हँसते हुए फूलों में जानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना

  • 3rd Nov 2025

    सुधारेंगे दुनिया को!

    प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- सुलझा नहीं सके जब अपने घर के मसले, हमने सोचा चलो सुधारेंगे दुनिया को!दुनिया का वह ट्रंप बहुत ही शातिर होगालेकिन उससे तो अपनी पहचान नहीं है।हाँ पर अपने पास विचार बहुत सारे हैं,उनको यहाँ बरत लेनाआसान नहीं है, बनें दूत हम विश्व-शांति केधाक…

  • 2nd Nov 2025

    सहरा में चराग़ों की!

    ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं,सहरा में चराग़ों की दुकानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना

  • 2nd Nov 2025

    राज़ नहीं रह सकता!

    साफ़ ज़ाहिर है कि अब राज़ नहीं रह सकता,राज़-दारों ने छुपाने की क़सम खाई है। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 2nd Nov 2025

    जिसने धोके में न आने

    डर यही है कि कहीं ख़ुद से न धोका खा जाए,जिस ने धोके में न आने की क़सम खाई है। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 2nd Nov 2025

    इन्क़िलाबात के शोले!

    इन्क़िलाबात के शोले भी कहीं बुझते हैं,आप ने आग बुझाने की क़सम खाई है। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

  • 2nd Nov 2025

    आशियानों को जलाने!

    बाग़बानों ने ये एहसास हुआ है मुझ को,आशियानों को जलाने की क़सम खाई है। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

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