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याद बे-सदा तेरी!
एक दश्त-ए-ख़ामोशी अब मिरा मुक़द्दर है,याद बे-सदा तेरी ज़ख़्म बे-चमन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल
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दर्द बे-वतन मेरा!
दिल भी खो गया शायद शहर के सराबों में,अब मिरी तरह से है दर्द बे-वतन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल
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सब हुनर सजाए थे!
मैं ने अपने चेहरे पर सब हुनर सजाए थे,फ़ाश कर गया मुझ को सादा पैरहन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल
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सारा बाँकपन मेरा!
उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा,उस की बंद मुट्ठी में सारा बाँकपन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल
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तेरा चेहरा नज़र आता!
ये मोहब्बत की अलामत तो नहीं है कोई,तेरा चेहरा नज़र आता है जिधर जाते हैं| शकील जमाली
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नदी कभी !
आज फिर से एक गीत लिखने का प्रयास किया है, आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है- नदी कभी नाला बन जाती है,नाला कभी नदी बन जाता है। कुदरत के छल-बल पर निर्भर हैजीव-जंतुओं की हो क्या हालत, पौधा कभी पनपता बंजर मेंफसलें पाले से हो जाती मृत। अरमानों का अमर दीप भी तोबुझता हुआ दिया…
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ख़ामोश गुज़र जाते हैं!
क्या जुनूँ-ख़ेज़ मसाफ़त थी तिरे कूचे की,और अब यूँ है कि ख़ामोश गुज़र जाते हैं| शकील जमाली
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पाँव में अब कोई!
पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम,दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं| शकील जमाली
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लोग साँसों का कफ़न!
ज़िंदगी ऐसे भी हालात बना देती है,लोग साँसों का कफ़न ओढ़ के मर जाते हैं| शकील जमाली