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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Aug 2025

    इंतिज़ार करते रहे!

    वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी,हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Aug 2025

    रोज़गार करते रहे!

    ख़याल-ए-यार कभी ज़िक्र-ए-यार करते रहे,इसी मताअ’ पे हम रोज़गार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Aug 2025

    रह-ए-ख़िज़ाँ में!

    रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे,शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Aug 2025

    बहुत जानी हुई सूरत!

    मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से,बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Aug 2025

    हैरानी नहीं जाती!

    कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा,मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Aug 2025

    मगर दिल है कि!

    कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से,मगर दिल है कि इस की ख़ाना-वीरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Aug 2025

    लगे उलझाने लोग!

    जीना पहले ही उलझन था,और लगे उलझाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 4th Aug 2025

    सबसे पहले के चमेली पुष्प- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…

  • 3rd Aug 2025

    कितने अनजाने लोग!

    जान के सब कुछ कुछ भी न जानें,हैं कितने अनजाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 3rd Aug 2025

    क्यूँ जाते मयख़ाने लोग

    दैर-ओ-हरम में चैन जो मिलता, क्यूँ जाते मयख़ाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

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