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इंतिज़ार करते रहे!
वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी,हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रह-ए-ख़िज़ाँ में!
रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे,शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बहुत जानी हुई सूरत!
मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से,बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हैरानी नहीं जाती!
कई बार इस की ख़ातिर ज़र्रे ज़र्रे का जिगर चेरा,मगर ये चश्म-ए-हैराँ जिस की हैरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मगर दिल है कि!
कई बार इस का दामन भर दिया हुस्न-ए-दो-आलम से,मगर दिल है कि इस की ख़ाना-वीरानी नहीं जाती| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सबसे पहले के चमेली पुष्प- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…