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सोच की दीवार से!
सोच की दीवार से लग कर हैं ग़म बैठे हुए,दिल में भी नग़्मा न कोई गुनगुनाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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कौन सा मौसम है ये!
तुम को है मालूम आख़िर कौन सा मौसम है ये,फ़स्ल-ए-गुल आने तलक ऐ ख़ुश-नवाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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सुब्ह होने तक न!
रात का पत्थर न पिघलेगा शुआ’ओं के बग़ैर,सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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सो रहे हैं दर्द !
सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो,सो रहे हैं दर्द उन को मत जगाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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और सिर्फ़ शाएर तू!
‘फ़राज़’ तू ने उसे मुश्किलों में डाल दिया,ज़माना साहब-ए-ज़र और सिर्फ़ शाएर तू| अहमद फ़राज़
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हो सके तो चला आ!
फ़ज़ा उदास है रुत मुज़्महिल है मैं चुप हूँ,जो हो सके तो चला आ किसी की ख़ातिर तू| अहमद फ़राज़
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आज के कवि
आज एक गीत, कविता और कवियों को लेकर- तुम इनसे क्या बात करोगे। तुम पूरे साधारण जन हो, ये हैं काव्य-जगत के नायक, अपने अपने दड़बों के ये विश्व विजेता महिमा गायक, इनकी पहुंच कहाँ तक प्यारे कैसे तहकीकात करोगे। जुड़े हुए इस या उस दल से नारे जैसी कविता लिखते एक तरफ सारे गुण…
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ये हर मक़ाम पे!
हँसी-ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है,ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू| अहमद फ़राज़
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दुनिया तुझे बदल देगी!
मैं जानता हूँ कि दुनिया तुझे बदल देगी,मैं मानता हूँ कि ऐसा नहीं ब-ज़ाहिर तू| अहमद फ़राज़