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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Aug 2025

    मिरी मिसाल कि!

    मिरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ,तिरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू| अहमद फ़राज़

  • 5th Aug 2025

    हुई है शाम तो!

    हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू,कहाँ गया है मिरे शहर के मुसाफ़िर तू| अहमद फ़राज़

  • 5th Aug 2025

    कितना अच्छा था कि!

    कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’,ग़ैर-मारूफ़ से गुमनाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 5th Aug 2025

    शाम से पहले पहले!

    सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की,वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 5th Aug 2025

    अब तिरे ज़िक्र पे !

    अब तिरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं,कितनी रग़बत थी तिरे नाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 5th Aug 2025

    लोग उजड़ जाते हैं!

    ख़ुश हो ऐ दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तू ने,लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 5th Aug 2025

    शाम से पहले पहले!

    साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले,हम को जाना है कहीं शाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 5th Aug 2025

    रात, नींद, सपने!

    आज के लिए एक गीतआप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- रात, नींद, सपनेकब होते अपने! अंधियारी रातों के सपने भी काले, रंग भरे हों भी तो भटकाने वाले,सच से हैं दूर बहुतये सारे सपने। नींद भी कहाँ अपनी, उड़ गई कहाँ पगली, मैं इधर तलाश रहापहुंची वो और गली,नींद के विजन वन कारास्ता मधुर सपने। कैसे…

  • 4th Aug 2025

    जो गाह गाह जुनूँ!

    उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है, जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Aug 2025

    हम अपने राज़ पे!

    हम अपने राज़ पे नाज़ाँ थे शर्मसार न थे,हर एक से सुख़न-ए-राज़-दार करते रहे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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