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दिल साफ़ ले लिया है!
क्या खेलता है नट की कला आँखों आँखों में, दिल साफ़ ले लिया है जो पूछा तो नट गया| नज़ीर अकबराबादी
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बहती हवा – रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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एक भी अपना नहीं!
किस तरह वो दिन भुलाऊँ जिस बुरे दिन का शरीक, एक भी अपना नहीं था और बेगाने कई| नज़ीर बनारसी
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वर्ना महफ़िल में थे!
मुझ को चुप रहना पड़ा बस आप का मुँह देख कर, वर्ना महफ़िल में थे मेरे जाने पहचाने कई| नज़ीर बनारसी
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सारी दुनिया आ रही!
सारी दुनिया आ रही है देखने के वास्ते, सर-फिरों ने एक कर डाले हैं वीराने कई| नज़ीर बनारसी
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आ गए दीवानगी की!
अक़्ल बढ़ कर बन गई थी दर्द-ए-सर जाते कहाँ,आ गए दीवानगी की हद में फ़रज़ाने कई| नज़ीर बनारसी
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पहले मैं दीवाना था!
एक दीवाने को आज आए हैं समझाने कई, पहले मैं दीवाना था और अब हैं दीवाने कई| नज़ीर बनारसी