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जवाँ है पेड़ मगर!
रहेगी धूप मिरे सर पे आख़िरी दिन तक,जवाँ है पेड़ मगर उस का आसरा क्या है| क़ैसर शमीम
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देखूँ कि इंतिहा क्या है!
अभी तो काट रही है हर एक साँस की धारअज़ल जब आए तो देखूँ कि इंतिहा क्या है क़ैसर शमीम
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मैं न भूला!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रामनरेश पाठक जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। पाठक जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामनरेश पाठक जी की यह कविता – मैं न भूला,है न छूटी राह,मेरे पास हर दिन तोनया अर्थ आ लगा है;इति नहीं…
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पलट के देखने वाले!
नज़र की धुँद में हैं भूली-बिसरी तस्वीरें,पलट के देखने वाले ये देखना क्या है| क़ैसर शमीम
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खंडर खंडर है यहाँ!
शिकस्ता ख़्वाब के मलबे में ढूँढता क्या है, खंडर खंडर है यहाँ धूल के सिवा क्या है| क़ैसर शमीम