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संगीत के लिए कुछ छंद
आज एक बार फिर से पुरानी पोस्ट दोहरा रहा हूँ। आज अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। (अनुवाद हेतु मूल रचनाएं मैं सामान्यतः ‘Poemhunter.com’ से लेता हूँ।) पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- संगीत के लिए…
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थी हर एक बात में!
थी हर एक बात में चाशनी हक़-ओ-सिद्क़-ओ-लुत्फ़-ओ-ख़ुलूस की,रह-ए-हक़ पे चलना शिआ’र था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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ये चली है कैसी हवा!
ये चली है कैसी हवा कि अब नहीं खिलते फूल मिलाप के,कभी दौर-ए-फ़स्ल-ए-बहार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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याद हो कि न याद हो!
कभी हम में तुम में भी प्यार था तुम्हें याद हो कि न याद हो,न किसी के दिल में ग़ुबार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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शब्द बच्चों की तरह!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री लीलाधर मंडलोई जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मंडलोई जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री लीलाधर मंडलोई जी की यह कविता – मेरे भीतर कोमल शब्दों की एक डायरी होगी जरूरमेरी कविता में स्त्रियां बहुत हैंमेरा मन स्त्री…
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मैं मुराद-ए-शौक़ को!
मैं मुराद-ए-शौक़ को पा के भी न मुराद-ए-शौक़ को पा सकूँ,दर-ए-मेहरबाँ पे पहुँच के भी दर-ए-मेहरबाँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी
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लोग कहते हैं ज़िंदगी!
जिसे लोग कहते हैं ज़िंदगी वो तो हादसों का हुजूम है, वो तो कहिए मेरा ही काम था कि मैं दरमियाँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी