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मोहब्बतों में कहाँ!
मोहब्बतों में कहाँ अपने वास्ते फ़ुर्सत,जिसे भी चाहे वो चाहे मिरी ख़ुशी देखो| जावेद अख़्तर
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कहाँ पे लाई है तुमको!
जब आईना कोई देखो इक अजनबी देखो,कहाँ पे लाई है तुम को ये ज़िंदगी देखो| जावेद अख़्तर
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शब्द और शब्द!
आज मैं हिंदी के महान कथाकार और कवि स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की दो कविताएं शेयर कर रहा हूँ। विष्णु जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विष्णु प्रभाकर जी की यह कविता – एक समा जाता हैश्वास में श्वासशेष रहता हैफिर कुछ नहींइस अनंत आकाश मेंशब्द…
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जो तेरे शहर में!
उन्हीं पे सारे मसाइब का बोझ रक्खा है,जो तेरे शहर में ईमान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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हम उस निगाह का!
ये ज़ख़्म-ए-दिल नहीं एहसान की निशानी है, हम उस निगाह का एहसान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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झुलसते ख़्वाबों की!
हमारे पास फ़क़त धूप है ख़यालों की,झुलसते ख़्वाबों की दुक्कान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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इन आँसुओं का कोई!
इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए,कि हम भी ‘मीर’ का दीवान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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बुझे बुझे से कुछ!
चराग़-ए-क़ुर्ब से कर दीजिए उन्हें रौशन,बुझे बुझे से कुछ अरमान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली