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उसने कहाँ का!
शहर भी लिक्खा मकाँ लिक्खा मोहल्ला लिखा,हम कहाँ के थे मगर उस ने कहाँ का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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जंगल कभी सहरा!
कभी जंगल कभी सहरा कभी दरिया लिख्खा,अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या क्या लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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ज़रा सी कम तो हुई है!
उजाला तो नहीं कह सकते इस को हम लेकिन,ज़रा सी कम तो हुई है ये तीरगी देखो| जावेद अख़्तर
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जो दूर जाए तो ग़म!
जो दूर जाए तो ग़म है जो पास आए तो दर्द,न जाने क्या है वो कम्बख़्त आदमी देखो| जावेद अख़्तर
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जो मेरी मोहब्बत!
जो हो सके तो ज़ियादा ही चाहना मुझ को,कभी जो मेरी मोहब्बत में कुछ कमी देखो| जावेद अख़्तर