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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th May 2025

    बे-ख़बर आए हैं!

    है ग़नीमत कि असरार-ए-हस्ती से हम,बे-ख़बर आए हैं बे-ख़बर जाएँगे| जौन एलिया

  • 29th May 2025

    क्या सितम है कि!

    कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं,क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे| जौन एलिया

  • 29th May 2025

    सब बिछड़ जाएँगे!

    रक़्स है रंग पर रंग हम-रक़्स हैं,सब बिछड़ जाएँगे सब बिखर जाएँगे| जौन एलिया

  • 29th May 2025

    सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम!

    बे-दिली क्या यूँही दिन गुज़र जाएँगे,सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम तो मर जाएँगे| जौन एलिया

  • 29th May 2025

    मर्सिया एक फ़क़त!

    हम ने कब शेर कहे हम से कहाँ शेर हुए,मर्सिया एक फ़क़त अपनी सदी का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 29th May 2025

    अपने अफ़्साने की!

    अपने अफ़्साने की शोहरत उसे मंज़ूर न थी,उस ने किरदार बदल कर मिरा क़िस्सा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 29th May 2025

    दोस्त पुराना लिख्खा!

    क्या ख़बर उस को लगे कैसा कि अब के हम ने,अपने इक ख़त में उसे दोस्त पुराना लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 29th May 2025

    ये जो मन की सीमा-रेखा है!

    आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट । हर वर्ष लगभग एक माह की अवधि में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद माथुर जी का जन्म दिन (22 जुलाई) और पुण्य तिथि 27 अगस्त दोनो ही आते हैं| 27 अगस्त,1976 को ही इस महान सुरीले गायक और फिल्मी दुनिया में इंसानियत की…

  • 28th May 2025

    काग़ज़ पे घरौंदा!

    सुन लिया होगा हवाओं में बिखर जाता है,इस लिए बच्चे ने काग़ज़ पे घरौंदा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 28th May 2025

    रात की पलकों पे!

    दिन के माथे पे तो सूरज ही लिखा था तू ने, रात की पलकों पे किस ने ये अँधेरा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

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