-
क्या सितम है कि!
कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं,क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे| जौन एलिया
-
सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम!
बे-दिली क्या यूँही दिन गुज़र जाएँगे,सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम तो मर जाएँगे| जौन एलिया
-
मर्सिया एक फ़क़त!
हम ने कब शेर कहे हम से कहाँ शेर हुए,मर्सिया एक फ़क़त अपनी सदी का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
-
अपने अफ़्साने की!
अपने अफ़्साने की शोहरत उसे मंज़ूर न थी,उस ने किरदार बदल कर मिरा क़िस्सा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
-
दोस्त पुराना लिख्खा!
क्या ख़बर उस को लगे कैसा कि अब के हम ने,अपने इक ख़त में उसे दोस्त पुराना लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
-
ये जो मन की सीमा-रेखा है!
आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट । हर वर्ष लगभग एक माह की अवधि में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश चंद माथुर जी का जन्म दिन (22 जुलाई) और पुण्य तिथि 27 अगस्त दोनो ही आते हैं| 27 अगस्त,1976 को ही इस महान सुरीले गायक और फिल्मी दुनिया में इंसानियत की…
-
काग़ज़ पे घरौंदा!
सुन लिया होगा हवाओं में बिखर जाता है,इस लिए बच्चे ने काग़ज़ पे घरौंदा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
-
रात की पलकों पे!
दिन के माथे पे तो सूरज ही लिखा था तू ने, रात की पलकों पे किस ने ये अँधेरा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम