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तेरे बग़ैर गुज़ारा!
तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती,तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़
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तरसते हैं बहुत से!
ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है ‘मंज़र’,तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को| मंज़र भोपाली
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पवन और पानी!
एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री सुश्री शांति सुमन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया शांति सुमन जी का यह नवगीत– मौसम की मनमानी – वह तो हद के पार गया ।सारे अँखुवों को खेतों में…
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जाते हो दरिया देखने!
कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी,ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को| मंज़र भोपाली
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बहुत से आइना-ख़ाने!
बहुत से आइना-ख़ाने हैं इस बस्ती में लेकिन,तरसती है हमारी आँख चेहरा देखने को| मंज़र भोपाली
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खड़े हैं राह चलते!
खड़े हैं राह चलते लोग कितनी ख़ामुशी से,सड़क पर मरने वालों का तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली
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गए थे शौक़ से हम!
गए थे शौक़ से हम भी ये दुनिया देखने को,मिला हम को हमारा ही तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली