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चलो कि धूप दरीचों में
उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें,चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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आउट ऑफ स्टेशन!
फिलहाल आगरा में हूँ और इंटरनेट कनेक्शन की भी समस्या है, अतः कुछ दिन पोस्ट डालने में दिक्कत हो सकती है।कोशिश करूंगा कि जब भी संभव हो संपर्क में रहूं!
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जब तक है दिलों में !
जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं,जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं| आरज़ू लखनवी
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पैमान-ए-वफ़ा भी !
जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ न बन जाए,पैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं| आरज़ू लखनवी
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हँसने में जो आँसू !
हँसने में जो आँसू आते हैं नैरंग-ए-जहाँ बतलाते हैं,हर रोज़ जनाज़े जाते हैं हर रोज़ बरातें होती हैं| आरज़ू लखनवी
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मेरा एक और गीत- मौसम का वायलिन
आज मैं अपना एक और नवगीत, शेयर कर रहा हूँ- हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है। मुझे आपकी सम्मति की प्रतीक्षा रहेगी- आप मेरे यू ट्यूब चैनल को भी सब्स्क्राइब करेंगे तो अच्छा लगेगा, लिंक यहाँ दिया गया है- https://www.youtube.com/@kris230450 आज के लिए इतना ही नमस्कार
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क़िस्मत जागे तो हम!
क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागें,दोनों ही को नींद आए जिस में कब ऐसी रातें होती हैं| आरज़ू लखनवी
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इस बदली हुई रुत में !
आँखों में कहाँ रस की बूँदें कुछ है तो लहू की लाली है,इस बदली हुई रुत में अब तो ख़ूनीं बरसातें होती हैं| आरज़ू लखनवी