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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Jul 2025

    वो ज़मीं महके!

    वो घड़ी-दो-घड़ी जहाँ बैठे,वो ज़मीं महके वो शजर महके| नवाज़ देवबंदी

  • 23rd Jul 2025

    दीद हो जाए तो!

    याद आए तो दिल मुनव्वर हो,दीद हो जाए तो नज़र महके| नवाज़ देवबंदी

  • 23rd Jul 2025

    सोचता रहा तुझ को!

    रात भर सोचता रहा तुझ को,ज़ेहन-ओ-दिल मेरे रात भर महके| नवाज़ देवबंदी

  • 23rd Jul 2025

    फिर सहर महके!

    शाम महके तिरे तसव्वुर से,शाम के बा’द फिर सहर महके| नवाज़ देवबंदी

  • 23rd Jul 2025

    आज फिर बादल घिरे हैं!

    अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ- आज फिर बादल घिरे हैं। हूँ नहीं वह यक्ष जिसकी यक्षिणी करती प्रतीक्षा, है नहीं संदेश कोई भेजने की तनिक इच्छा, हर दिशा में दिग्विजय के अश्व देते हैं दिखाई, और अपनी ही दशा पर आ रही फिर-फिर रुलाई, बालपन के करुण पल बन स्वप्न आंखों…

  • 22nd Jul 2025

    तेरे आने की जब!

    तेरे आने की जब ख़बर महके,तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके| नवाज़ देवबंदी

  • 22nd Jul 2025

    बोल ना मेरे यारा!

    कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ, बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    वो भी सिर्फ़ हमारा!

    हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ,वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    दर्द किसी को प्यारा!

    कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है,दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    लफ़्ज़ कोई अँगारा!

    यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है,लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

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