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आज फिर बादल घिरे हैं!
अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ- आज फिर बादल घिरे हैं। हूँ नहीं वह यक्ष जिसकी यक्षिणी करती प्रतीक्षा, है नहीं संदेश कोई भेजने की तनिक इच्छा, हर दिशा में दिग्विजय के अश्व देते हैं दिखाई, और अपनी ही दशा पर आ रही फिर-फिर रुलाई, बालपन के करुण पल बन स्वप्न आंखों…
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बोल ना मेरे यारा!
कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ, बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़
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वो भी सिर्फ़ हमारा!
हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ,वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़
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दर्द किसी को प्यारा!
कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है,दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़