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टिकटिकी बाँधे वो!
टिकटिकी बाँधे वो तकते हैं मैं इस घात में हूँ,कहीं खाने लगे चक्कर न ये ठहरा पानी| आरज़ू लखनवी
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जब हम दोनो ज़ुदा हुए!
आज एक पुरानी पोस्ट दोहराने का दिन है। आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- हम दोनो जब ज़ुदा हुएखामोशी और आंसुओं के बीच,टूटे हुए दिल के साथ,बरसों…
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चाह में पाऊँ कहाँ!
चाह में पाऊँ कहाँ आस का मीठा पानी,प्यास भड़की हुई है और नहीं मिलता पानी| आरज़ू लखनवी
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सैंकड़ों डूब गए!
रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी,सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी| आरज़ू लखनवी
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किरदार बदल कर!
अपने अफ़्साने की शोहरत उसे मंज़ूर न थी,उस ने किरदार बदल कर मिरा क़िस्सा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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मर्सिया एक फ़क़त!
हम ने कब शेर कहे हम से कहाँ शेर हुए,मर्सिया एक फ़क़त अपनी सदी का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम