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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 26th Jul 2025

    टिकटिकी बाँधे वो!

    टिकटिकी बाँधे वो तकते हैं मैं इस घात में हूँ,कहीं खाने लगे चक्कर न ये ठहरा पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Jul 2025

    फैलती धूप का है!

    फैलती धूप का है रूप लड़कपन का उठान,दोपहर ढलते ही उतरेगा ये चढ़ता पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Jul 2025

    टूट के बरसा पानी!

    किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी,झूम कर आई घटा टूट के बरसा पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Jul 2025

    आँख से टपका पानी!

    दिल से लौका जो उठा आँख से टपका पानी,आग से आज निकलते हुए देखा पानी| आरज़ू लखनवी

  • 26th Jul 2025

    जब हम दोनो ज़ुदा हुए!

    आज एक पुरानी पोस्ट दोहराने का दिन है। आज फिर से अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- हम दोनो जब ज़ुदा हुएखामोशी और आंसुओं के बीच,टूटे हुए दिल के साथ,बरसों…

  • 25th Jul 2025

    चाह में पाऊँ कहाँ!

    चाह में पाऊँ कहाँ आस का मीठा पानी,प्यास भड़की हुई है और नहीं मिलता पानी| आरज़ू लखनवी

  • 25th Jul 2025

    भरम का पानी!

    आँख से बह नहीं सकता है भरम का पानी,फूट भी जाएगा छाला तो न देगा पानी| आरज़ू लखनवी

  • 25th Jul 2025

    सैंकड़ों डूब गए!

    रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी,सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी| आरज़ू लखनवी

  • 25th Jul 2025

    किरदार बदल कर!

    अपने अफ़्साने की शोहरत उसे मंज़ूर न थी,उस ने किरदार बदल कर मिरा क़िस्सा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

  • 25th Jul 2025

    मर्सिया एक फ़क़त!

    हम ने कब शेर कहे हम से कहाँ शेर हुए,मर्सिया एक फ़क़त अपनी सदी का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम

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