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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Aug 2025

    ख़ामुशी से जल गया!

    न जाने गुफ़्तुगू क्या गुल खिलाए,तुम्हारी ख़ामुशी से जल गया हूँ| अब्दुल्लाह कमाल

  • 3rd Aug 2025

    नदी कभी-2

    कल एक गीत लिखा था, आज उसमें ही कुछ और छंद जोडे हैं, आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है- नदी कभी नाला बन जाती है, नाला कभी नदी बन जाता है। कुदरत के बलिष्ठ सेनानी हैं वायु, मेघ, पर्वत, सूरज, तारे ये ही मंत्री, यही विधायक हैं दैवी शासन के ये रखवारे, इनका रुख बदला…

  • 2nd Aug 2025

    छलकता जाम हूँ!

    छलकता जाम हूँ फिर भी हूँ प्यासा,मैं अपने आप में इक कर्बला हूँ| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    बहुत अनमोल हूँ!

    मिरी क़ीमत ज़मीन-ओ-आसमाँ है,बहुत अनमोल हूँ फिर भी बिका हूँ| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    पाबंद-ए-वफ़ा हूँ!

    बड़ा मुख़्लिस हूँ पाबंद-ए-वफ़ा हूँ,किसी की सादगी पर रो पड़ा हूँ| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    गाँव की हवाओं ने!

    गाँव की हवाओं ने फिर संदेसा भेजा है,मुंतज़िर तुम्हारा है ख़ुशबुओं का बन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    याद बे-सदा तेरी!

    एक दश्त-ए-ख़ामोशी अब मिरा मुक़द्दर है,याद बे-सदा तेरी ज़ख़्म बे-चमन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    दर्द बे-वतन मेरा!

    दिल भी खो गया शायद शहर के सराबों में,अब मिरी तरह से है दर्द बे-वतन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    सब हुनर सजाए थे!

    मैं ने अपने चेहरे पर सब हुनर सजाए थे,फ़ाश कर गया मुझ को सादा पैरहन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल

  • 2nd Aug 2025

    सारा बाँकपन मेरा!

    उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा,उस की बंद मुट्ठी में सारा बाँकपन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल

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