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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Aug 2025

    लगे उलझाने लोग!

    जीना पहले ही उलझन था,और लगे उलझाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 4th Aug 2025

    सबसे पहले के चमेली पुष्प- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…

  • 3rd Aug 2025

    कितने अनजाने लोग!

    जान के सब कुछ कुछ भी न जानें,हैं कितने अनजाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 3rd Aug 2025

    क्यूँ जाते मयख़ाने लोग

    दैर-ओ-हरम में चैन जो मिलता, क्यूँ जाते मयख़ाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 3rd Aug 2025

    मुझ को होश नहीं है!

    अब जब मुझ को होश नहीं है,आए हैं समझाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 3rd Aug 2025

    जाने-पहचाने लोग!

    वक़्त पे काम नहीं आते हैं,ये जाने-पहचाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 3rd Aug 2025

    आए हैं समझाने लोग!

    आए हैं समझाने लोग,हैं कितने दीवाने लोग| कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

  • 3rd Aug 2025

    मैं बुझ कर जला हूँ!

    ‘कमाल’ इस क़त्ल-गाह-ए-रौशनी में,हज़ारों बार मैं बुझ कर जला हूँ| अब्दुल्लाह कमाल

  • 3rd Aug 2025

    किताब-ए-दिल को!

    किताब-ए-दिल को दीमक लग गई है,तुम्हारा नाम क्या है ढूँढता हूँ| अब्दुल्लाह कमाल

  • 3rd Aug 2025

    ख़ामुशी से जल गया!

    न जाने गुफ़्तुगू क्या गुल खिलाए,तुम्हारी ख़ामुशी से जल गया हूँ| अब्दुल्लाह कमाल

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