-
हो सके तो चला आ!
फ़ज़ा उदास है रुत मुज़्महिल है मैं चुप हूँ,जो हो सके तो चला आ किसी की ख़ातिर तू| अहमद फ़राज़
-
आज के कवि
आज एक गीत, कविता और कवियों को लेकर- तुम इनसे क्या बात करोगे। तुम पूरे साधारण जन हो, ये हैं काव्य-जगत के नायक, अपने अपने दड़बों के ये विश्व विजेता महिमा गायक, इनकी पहुंच कहाँ तक प्यारे कैसे तहकीकात करोगे। जुड़े हुए इस या उस दल से नारे जैसी कविता लिखते एक तरफ सारे गुण…
-
ये हर मक़ाम पे!
हँसी-ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है,ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू| अहमद फ़राज़
-
दुनिया तुझे बदल देगी!
मैं जानता हूँ कि दुनिया तुझे बदल देगी,मैं मानता हूँ कि ऐसा नहीं ब-ज़ाहिर तू| अहमद फ़राज़
-
मिरी मिसाल कि!
मिरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ,तिरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू| अहमद फ़राज़
-
हुई है शाम तो!
हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू,कहाँ गया है मिरे शहर के मुसाफ़िर तू| अहमद फ़राज़
-
कितना अच्छा था कि!
कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’,ग़ैर-मारूफ़ से गुमनाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
-
अब तिरे ज़िक्र पे !
अब तिरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं,कितनी रग़बत थी तिरे नाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
-
लोग उजड़ जाते हैं!
ख़ुश हो ऐ दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तू ने,लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़