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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Aug 2025

    कैसे मिलाता है मुझे!

    तेरा मुंकिर नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है,बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे| शहरयार

  • 8th Aug 2025

    ख़्वाबों से पशेमानी है!

    मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है,नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे| शहरयार

  • 8th Aug 2025

    कौन बुलाता है मुझे!

    रात का वक़्त है सूरज है मिरा राह-नुमा,देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे| शहरयार

  • 8th Aug 2025

    दिल में रखता है न!

    दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे,फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे| शहरयार

  • 8th Aug 2025

    उस आख़िरी नज़र में !

    उस आख़िरी नज़र में अजब दर्द था ‘मुनीर’,जाने का उस के रंज मुझे उम्र भर रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 8th Aug 2025

    पांव हुए पत्थर के!

    अपनी एक नई रचना आज आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ- कूदे हम खूब कभी कविता की रस्सी, अब तो लगता जैसे पाँव हुए पत्थर के| ऐसा कविता लेखन हुआ आपका श्रीमन, जैसे हो जंगल में मोर कोई नाचा| हर गूंगी हरकत जो यदा-कदा कर पाए किसने परखा उसको किसने है जांचा। भटके…

  • 7th Aug 2025

    यही दिल में डर रहा!

    ख़ौफ़ आसमाँ के साथ था सर पर झुका हुआ, कोई है भी या नहीं है यही दिल में डर रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Aug 2025

    दूरी का ये तिलिस्म!

    गुज़री है क्या मज़े से ख़यालों में ज़िंदगी, दूरी का ये तिलिस्म बड़ा कारगर रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Aug 2025

    मेरी सदा हवा में!

    मेरी सदा हवा में बहुत दूर तक गई,पर मैं बुला रहा था जिसे बे-ख़बर रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 7th Aug 2025

    सुब्ह-ए-सफ़र की!

    सुब्ह-ए-सफ़र की रात थी तारे थे और हवा,साया सा एक देर तलक बाम पर रहा| मुनीर नियाज़ी

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