अपनी एक नई रचना आज आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ-

कूदे हम खूब कभी
कविता की रस्सी,
अब तो लगता जैसे
पाँव हुए पत्थर के|
ऐसा कविता लेखन
हुआ आपका श्रीमन,
जैसे हो जंगल में
मोर कोई नाचा|
हर गूंगी हरकत जो
यदा-कदा कर पाए
किसने परखा उसको
किसने है जांचा।
भटके यूं जीवन में
चाह के विजन वन में,
होकर हम आज रहे
घाट के न घर के।
भाव थे उमगते
शब्दों में ढल जाते थे,
तब तो हम कविता में
अक्सर बतियाते थे,
चलती थी कविता भी
साथ सदा अपने,
उसमें ही डूब-डूब
हम रोते-गाते थे।
वह उछाल कहाँ गई
भाविक संप्रेषण की
आंखों से भाव सिर्फ
आंसू बन ढरके।
मंचों से जुड़कर,
कमा लें विशेषण कुछ
तभी लोग जानेंगे,
अच्छा कवि हैं ये भी!
पलते हैं नगरों में
हिंदी पट्टी के, सर्जक औ
बाजीगर कविता के भी,
पहला परिवेश कहाँ
अब फिर मिल पाएगा
एकाकीपन की यह
नदी पार करके।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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