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यही दिल में डर रहा!
ख़ौफ़ आसमाँ के साथ था सर पर झुका हुआ, कोई है भी या नहीं है यही दिल में डर रहा| मुनीर नियाज़ी
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दूरी का ये तिलिस्म!
गुज़री है क्या मज़े से ख़यालों में ज़िंदगी, दूरी का ये तिलिस्म बड़ा कारगर रहा| मुनीर नियाज़ी
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मेरी सदा हवा में!
मेरी सदा हवा में बहुत दूर तक गई,पर मैं बुला रहा था जिसे बे-ख़बर रहा| मुनीर नियाज़ी
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दिल जल रहा था!
दिल जल रहा था ग़म से मगर नग़्मा-गर रहा,जब तक रहा मैं साथ मिरे ये हुनर रहा| मुनीर नियाज़ी
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अन-कहे सवाल की!
देख के मुझ को ग़ौर से फिर वो चुप से हो गए,दिल में ख़लिश है आज तक इस अन-कहे सवाल की| मुनीर नियाज़ी
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उस परी-जमाल की!
उम्र के साथ अजीब सा बन जाता है आदमी,हालत देख के दुख हुआ आज उस परी-जमाल की| मुनीर नियाज़ी
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मेरे किसी ख़याल की!
शाम झुकी थी बहर पर पागल हो कर रंग से,या तस्वीर थी ख़्वाब में मेरे किसी ख़याल की| मुनीर नियाज़ी
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रात बीते साल की!
आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की,यही हवा थी बाग़ में यही सदा घड़ियाल की| मुनीर नियाज़ी
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मौत से ठन गई!
एक बार फिर से आज मैं, हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता – ठन गई!मौत से ठन गई! जूझने का…