-
नज़र जो कोई भी!
नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता,किसी को क्या मुझे ख़ुद भी यक़ीं नहीं आता| शहरयार
-
क़िस्सा-ए-दर्द में!
क़िस्सा-ए-दर्द में ये बात कहाँ से आई,मैं बहुत हँसता हूँ जब कोई सुनाता है मुझे| शहरयार
-
कैसे मिलाता है मुझे!
तेरा मुंकिर नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है,बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे| शहरयार
-
ख़्वाबों से पशेमानी है!
मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है,नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे| शहरयार
-
कौन बुलाता है मुझे!
रात का वक़्त है सूरज है मिरा राह-नुमा,देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे| शहरयार
-
दिल में रखता है न!
दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे,फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे| शहरयार
-
उस आख़िरी नज़र में !
उस आख़िरी नज़र में अजब दर्द था ‘मुनीर’,जाने का उस के रंज मुझे उम्र भर रहा| मुनीर नियाज़ी
-
पांव हुए पत्थर के!
अपनी एक नई रचना आज आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ- कूदे हम खूब कभी कविता की रस्सी, अब तो लगता जैसे पाँव हुए पत्थर के| ऐसा कविता लेखन हुआ आपका श्रीमन, जैसे हो जंगल में मोर कोई नाचा| हर गूंगी हरकत जो यदा-कदा कर पाए किसने परखा उसको किसने है जांचा। भटके…
-
यही दिल में डर रहा!
ख़ौफ़ आसमाँ के साथ था सर पर झुका हुआ, कोई है भी या नहीं है यही दिल में डर रहा| मुनीर नियाज़ी