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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Aug 2025

    मेरी करवट पर जाग उठ्ठे!

    मेरी करवट पर जाग उठ्ठे,नींद का कितना कच्चा चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    घूम रहा है तन्हा चाँद!

    यादों की आबाद गली में,घूम रहा है तन्हा चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    सहमा सहमा चाँद!

    किस मक़्तल से गुज़रा होगा,इतना सहमा सहमा चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    रात हुई और निकला चाँद!

    दिन में वहशत बहल गई,रात हुई और निकला चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    पूरा दुख और आधा चाँद!

    पूरा दुख और आधा चाँद,हिज्र की शब और ऐसा चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    बिछड़ना है तो बिछड़ जा!

    बिछड़ना है तो बिछड़ जा इसी दो-राहे पर,कि मोड़ आगे सफ़र में कहीं नहीं आता| शहरयार

  • 9th Aug 2025

    पांव हुए पत्थर के-2

    कल एक नया गीत शेयर किया था, उसी शीर्षक से अपनी एक और नई रचना आज आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ- कूदे हम खूब कभी कविता की रस्सी,अब तो लगता जैसे पाँव हुए पत्थर के| वह छलांग पहले की कविता में, बाहर भीमित्रों की महफिल में औ घर के अंदर भी, बेफिक्री…

  • 8th Aug 2025

    ये मेरा दिल है कि!

    ये मेरा दिल है कि मंज़र उजाड़ बस्ती का,खुले हुए हैं सभी दर मकीं नहीं आता| शहरयार

  • 8th Aug 2025

    जो होने वाला है!

    जो होने वाला है अब उस की फ़िक्र क्या कीजे,जो हो चुका है उसी पर यक़ीं नहीं आता| शहरयार

  • 8th Aug 2025

    जहाँ पे चाहिए आना!

    तिरा ख़याल भी तेरी तरह सितमगर है,जहाँ पे चाहिए आना वहीं नहीं आता| शहरयार

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