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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Aug 2025

    शबनम थी या नन्हा चाँद!

    सूखे पत्तों के झुरमुट पर,शबनम थी या नन्हा चाँद| परवीन शाकिर

  • 10th Aug 2025

    देख रहा है सपना चाँद!

    रात के शाने पर सर रक्खे,देख रहा है सपना चाँद| परवीन शाकिर

  • 10th Aug 2025

    बादल के रेशम झूले में!

    बादल के रेशम झूले में,भोर समय तक सोया चाँद| परवीन शाकिर

  • 10th Aug 2025

    जाने किसको झाँका चाँद!

    बरगद की इक शाख़ हटा कर,जाने किस को झाँका चाँद| परवीन शाकिर

  • 10th Aug 2025

    पीर एक पलती थी!

    एक कविता, अंग्रेजी उपन्यास ‘थर्टीन रीज़ंस व्हाई’ पढने के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप- हाँ हमारे बीच ही एक पीर पलती थी। सबसे बतियाती, सब अतिक्रमण सहा करती, जैसे भी हो, सबसे घुलमिल कर रहती थी, सहती थी जो कुछ भी बुरा लोग करते थे, बेचारी किससे क्या कुछ कह सकती थी। चली गई, छोडकर  वृतांत दुखी…

  • 9th Aug 2025

    जब पानी में चेहरा देखा!

    जब पानी में चेहरा देखा,तू ने किस को सोचा चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    सूरज का है साया चाँद!

    इतने रौशन चेहरे पर भी,सूरज का है साया चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    आँसू रोके नूर नहाए!

    आँसू रोके नूर नहाए,दिल दरिया तन सहरा चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    देख रहा है भोला चाँद!

    मेरे मुँह को किस हैरत से,देख रहा है भोला चाँद| परवीन शाकिर

  • 9th Aug 2025

    मेरी करवट पर जाग उठ्ठे!

    मेरी करवट पर जाग उठ्ठे,नींद का कितना कच्चा चाँद| परवीन शाकिर

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