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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Aug 2025

    उतनी ही हर नदी है!

    छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से,उतनी ही हर नदी है यहाँ जितनी प्यास है| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Aug 2025

    इतना भी बन-सँवर के!

    इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई,लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Aug 2025

    माने न माने कोई!

    माने न माने कोई हक़ीक़त तो है यही,चर्ख़ा है जिस के पास उसी की कपास है| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Aug 2025

    वही बात ख़ास है!

    मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो,क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Aug 2025

    यूँ लग रहा है जैसे कोई!

    यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है,वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है| निदा फ़ाज़ली

  • 12th Aug 2025

    धूप !

    आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- मेघ, पर्वत, वायुमंडल पार करती है, लड़खड़ाती धूप धरती पर उतरती है। चीरकर बादल कभी झरना बनी आती, पर्वतों की बर्फ परबरबस फिसल जातीवृक्ष छतरी मेंकभी कुछ पल उलझ जातीपहुंच आंगन में तनिक आराम करती है। गगनचुंबी भवन में जब यह पहुंच जाती ऊपरी मंज़िलों…

  • 11th Aug 2025

    आग के इक क़लम की!

    आग के इक क़लम की सियाही लगा,जो धुआँ ‘नूर’ गंगा किनारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    अपनी कश्ती अब अपने!

    झील पतवार वापस न देगी कभी,अपनी कश्ती अब अपने सहारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    रंग से रंग मिलने!

    रंग से रंग मिलने न पाए कहीं,एक एक कर के सारे नज़ारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th Aug 2025

    तेरा मक़्सद है क्या!

    तेरा मक़्सद है क्या मैं समझ जाऊँगा,कोई मौसम ही की बात प्यारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

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