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मुरली सा कोई शख्स!
मुरली सा कोई शख्स बजा जब भी ध्यान में,मेरे बदन की आबो-हवा गोकुली हुई। सूर्यभानु गुप्त
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चुपचाप देखती रही!
लट्टू की तरह घूम के चौराहा सो गया,चुपचाप देखती रही खिड़की खुली हुई। सूर्यभानु गुप्त
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दरिया के पास धूप!
दरिया के पास धूप को बरगद कोई मिला,दरिया के पास धूप ज़रा काकुली हुई। सूर्यभानु गुप्त
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शहर की भाषा धुली हुई!
कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गये,फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई। सूर्यभानु गुप्त
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मुझको मिली कल एक!
अपने बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया,मुझको मिली कल एक जो लड़की खुली हुई। सूर्यभानु गुप्त
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मेरे लहू में घुली हुई!
मुझको उदास करने की ज़िद पर तुली हुई,क्या चीज़ है ये मेरे लहू में घुली हुई। सूर्यभानु गुप्त
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मेरे सीने में क्यूँ!
देने वाले ये हस्सास नाज़ुक सा दिल,मेरे सीने में क्यूँ ख़ास कर रख दिया| उदय प्रताप सिंह
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शाहदरा-कुछ स्मृतियां!
फिर एक बार याद आया शाहदरा। दिल्ली का यह यमुना-पार, हम थे जब यहाँतब एक ही पुल था यमुना परअंग्रेजों के ज़माने का,अब उम्र है उसकी सौ वर्ष से अधिक, नीचे कार-बस, ऊपर रेल। हमारे समय में अकेला थायह पुल चींटियों की तरह रेंगती थीं बसें इसमें, बात है 1950 से 80 तक की। शाहदरा,…