-
हम लाए हैं घर में!
डर है कि न ले जाए वो हम को भी चुरा कर,हम लाए हैं घर में जिसे मेहमान बना कर| क़तील शिफ़ाई
-
लूटा है सदा जिसने!
लूटा है सदा जिस ने हमें दोस्त बना कर, हम ख़ुश हैं उसी शख़्स से फिर हाथ मिला कर| क़तील शिफ़ाई
-
क्यों जागा करते हो कविवर!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- क्यों जागा करते हो कविवरखोज रहे हो क्या रातों में! केवल छत को देख सकोगेलेट पलंग पर कमरे में तुमबहुमंज़िला इमारत है यहइधर हुआ है चंदा भी गुम, छिटपुट तारे देख उन्हेंक्या उलझाओगे बातों में। ये दुनिया का मेला भ्रम हैकिसे यहाँ संतोष मिलेगा,भाग्यवान वह…
-
दस्तार जिन्हें दी है!
शर्मिंदा उन्हें और भी ऐ मेरे ख़ुदा कर,दस्तार जिन्हें दी है उन्हें सर भी अता कर| क़तील शिफ़ाई
-
ज़ियादा कामयाबी भी!
ज़ियादा कामयाबी भी बहुत नुक़सान देती है,फलों का बोझ बढ़ने से भी पौदे टूट जाते है| वसीम नादिर
-
पिंजरे टूट जाते हैं!
बहुत दिन मस्लहत की क़ैद में रहते नहीं जज़्बे,मोहब्बत जब सदा देती है पिंजरे टूट जाते हैं| वसीम नादिर
-
अच्छे अच्छे टूट जाते!
मिरी औक़ात ही क्या है मैं इक नन्हा सा आँसू हूँ,बुलंदी से तो गिर कर अच्छे अच्छे टूट जाते हैं| वसीम नादिर
-
लोग कैसे टूट जाते है!
बिछड़ कर आप से ये तजरबा हो ही गया आख़िर,मैं अक्सर सोचता था लोग कैसे टूट जाते है| वसीम नादिर
-
सुर की गति मैं क्या जानूं!
आज फिर से मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ संत सूरदास जी का यह भजन जो मुकेश जी ने गाया है- सुर की गति मैं क्या जानूं, एक भजन करना जानूं आशा है आपको यह पसंद आएगा। धन्यवाद