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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Oct 2025

    ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ !

    ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ था मैं बहार में तू,मगर ये फ़स्ल-ए-सितम-आश्ना किसी की नहीं| अहमद फ़राज़

  • 25th Oct 2025

    सदा किसी की नहीं!

    ये शहर सेहर-ज़दा* है सदा किसी की नहीं,यहाँ ख़ुद अपने लिए भी दुआ किसी की नहीं| *खौफनाक अहमद फ़राज़

  • 25th Oct 2025

    बुत से दोस्ताना किया!

    वो हीला-गर जो वफ़ा-जू भी है जफ़ा-ख़ू भी,किया भी ‘फ़ैज़’ तो किस बुत से दोस्ताना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 25th Oct 2025

    कब जाओगे बादल!

    आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- वापस कब जाओगे बादलरस्ता भूल गए। जहाँ ज़रूरत नहीं रही अबअटके हो ग़ोवा मेंबुला रही रजधानी उलझी हैविष भरी हवा में, कैसे लानी है मौसम मेंसमता भूल गए। कुछ तो अनुशासन सीखो तुमबादल मेरे भाई,कहीं बरसते बे मौसम परकहीं बूंद न आई यूं…

  • 24th Oct 2025

    सहा तो क्या न सहा!

    थे ख़ाक-ए-राह भी हम लोग क़हर-ए-तूफ़ाँ भी,सहा तो क्या न सहा और किया तो क्या न किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 24th Oct 2025

    सुलूक जिससे किया!

    ग़म-ए-जहाँ हो रुख़-ए-यार हो कि दस्त-ए-अदू,सुलूक जिस से किया हम ने आशिक़ाना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 24th Oct 2025

    ये किस ख़लिश ने!

    ये किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया,फिर आज किस ने सुख़न हम से ग़ाएबाना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 24th Oct 2025

    जितना लहू था सर्फ़!

    उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग,जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 24th Oct 2025

    अपना इख़्तियार है !

    अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें,रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 24th Oct 2025

    ख़फ़ा कर चुके हैं हम!

    देखें है कौन कौन ज़रूरत नहीं रही,कू-ए-सितम में सब को ख़फ़ा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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