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जनाज़ा तिरे दीवाने का!
हड्डियाँ हैं कई लिपटी हुई ज़ंजीरों में,लिए जाते हैं जनाज़ा तिरे दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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आँखों में लहू की बूँदें!
दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें,सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का| फ़ानी बदायुनी
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यूँ बहकना नहीं अच्छा!
अब इसे दार पे ले जा के सुला दे साक़ी,यूँ बहकना नहीं अच्छा तिरे मस्ताने का| फ़ानी बदायुनी
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आओ देखो न तमाशा!
तुम ने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग,आओ देखो न तमाशा मिरे ग़म-ख़ाने का| फ़ानी बदायुनी
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ढूँडती है कोई हीला!
ज़िंदगी भी तो पशेमाँ है यहाँ ला के मुझे,ढूँडती है कोई हीला मिरे मर जाने का| फ़ानी बदायुनी
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आस्ताना है हरम!
का’बे को दिल की ज़ियारत के लिए जाता हूँ,आस्ताना है हरम मेरे सनम-ख़ाने का| फ़ानी बदायुनी
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भेस है परवाने का!
हुस्न है ज़ात मिरी इश्क़ सिफ़त है मेरी,हूँ तो मैं शम्अ मगर भेस है परवाने का| फ़ानी बदायुनी
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ख़्वाब है दीवाने का!
इक मुअ’म्मा है समझने का न समझाने का,ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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आस पंछी सी!
अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ- आस पंछी सी कहाँ के गीत गाती है, एक पल में सब दिशाएं छान आती है। कौन सा आंगन सखा है कौन शत्रु गली, वर्जनाएं कुछ नहीं ये मानती पगली, सभी सीमाएं तुरंत फलांग आती है। ज़िंदगी में राग-रस पैदा यही करती, सगुन के अक्षत सकारे…
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ख़ल्क़ कहती है जिसे!
ख़ल्क़ कहती है जिसे दिल तिरे दीवाने का,एक गोशा है ये दुनिया इसी वीराने का| फ़ानी बदायुनी