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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 30th Aug 2025

    ख़्वाबों को झुलसाएँगे!

    इस जानिब हम उस जानिब तुम बीच में हाइल एक अलाव,कब तक हम तुम अपने अपने ख़्वाबों को झुलसाएँगे| बशर नवाज़

  • 30th Aug 2025

    अब मिल जाए मनाएँगे!

    वो भी कोई हम ही सा मासूम गुनाहों का पुतला था, नाहक़ उस से लड़ बैठे थे अब मिल जाए मनाएँगे| बशर नवाज़

  • 30th Aug 2025

    अपने हँसते चेहरे!

    चढ़ता दरिया एक न इक दिन ख़ुद ही किनारे काटेगा,अपने हँसते चेहरे कितने तूफ़ानों को छुपाएँगे| बशर नवाज़

  • 30th Aug 2025

    तुम भी तंग आ जाओगे!

    रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे,तुम भी तंग आ जाओगे इक दिन हम भी उक्ता जाएँगे| बशर नवाज़

  • 30th Aug 2025

    हाथ तो मिलाया कर!

    कौन कहता है दिल मिलाने को,कम से कम हाथ तो मिलाया कर| शकील आज़मी

  • 30th Aug 2025

    रोज़ ही बनाया कर!

    कोई तस्वीर कोई अफ़साना,कुछ न कुछ रोज़ ही बनाया कर| शकील आज़मी

  • 30th Aug 2025

    ख़ुशबुएँ उड़ाया कर!

    घर से बाहर निकल हवाओं में,ज़ुल्फ़ से ख़ुशबुएँ उड़ाया कर| शकील आज़मी

  • 30th Aug 2025

    धूप मायूस लौट जाती है!

    धूप मायूस लौट जाती है,छत पे कपड़े सुखाने आया कर| शकील आज़मी

  • 30th Aug 2025

    चाँद लाकर कोई!

    चाँद ला कर कोई नहीं देगा,अपने चेहरे से जगमगाया कर| शकील आज़मी

  • 30th Aug 2025

    वे हवाएं खो गई हैं!

    आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- साथ लेकर मैं कभी जिनको चला था, रास्ते में वे हवाएं खो गई हैं। वे सुकोमल भाव के स्वप्निल बिछौने कूदते वे सृजन के मदमस्त छौने, सफलता की राह पर आगे बढे़ तब सिरफिरी परिकल्पनाएं खो गई हैं। पेट की खातिर यहाँ जीवन जिए हैं…

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