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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Sep 2025

    ज़िंदगी अब कहीं नहीं है!

    तुम अपने क़स्बों में जा के देखो वहाँ भी अब शहर ही बसे हैं,कि ढूँढते हो जो ज़िंदगी तुम वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 5th Sep 2025

    वो आग बरसी है!

    वो आग बरसी है दोपहर में कि सारे मंज़र झुलस गए हैं,यहाँ सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 5th Sep 2025

    वरक़ पलटता हूँ मैं जो!

    गुज़र गया वक़्त दिल पे लिख कर न जाने कैसी अजीब बातें,वरक़ पलटता हूँ मैं जो दिल के तो सादगी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 5th Sep 2025

    ख़ुद को पलट के देखा!

    बहुत दिनों बा‘द पाई फ़ुर्सत तो मैं ने ख़ुद को पलट के देखा, मगर मैं पहचानता था जिस को वो आदमी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 5th Sep 2025

    ज़मीं बची अब कहीं नहीं!

    निगल गए सब की सब समुंदर ज़मीं बची अब कहीं नहीं है,बचाते हम अपनी जान जिस में वो कश्ती भी अब कहीं नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 5th Sep 2025

    बदल गई है ज़िंदगी!

    बदल गई है ज़िंदगी बदल गए हैं लोग भी,ख़ुलूस का जो था कभी वो अब सिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

  • 4th Sep 2025

    ग़रीब जैसे हो गए!

    ख़ज़ाना तुम न पाए तो ग़रीब जैसे हो गए,पलक पे अब कोई भी मोती झिलमिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

  • 4th Sep 2025

    मगर खिला नहीं रहा!

    न हिज्र है न वस्ल है अब इस को कोई क्या कहे, कि फूल शाख़ पर तो है मगर खिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

  • 4th Sep 2025

    बीमार नहीं है वह!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की यह कविता- बीमार नहीं है वहकभी-कभी बीमार-सा पड़ जाता हैउनकी ख़ुशी के लिएजो सचमुच बीमार रहते हैं। किसी दिन मर भी…

  • 3rd Sep 2025

    अब कोई गिला नहीं रहा!

    यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा,तो शुक्र कीजिए कि अब कोई गिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर

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