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अब जो मेरे साथ है!
हो चुकी हैं मुश्किलात-ए-राह सब पर आश्कार,अब जो मेरे साथ है अपनी ख़ुशी के साथ| रईस रामपुरी
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कोई किसी के साथ है!
अपनी अपनी मस्लहत है अपना अपना है मफ़ाद,वर्ना इस दुनिया में कब कोई किसी के साथ है| रईस रामपुरी
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इक न इक हमदर्द!
ज़िंदा रखने की रिवायत आस्तीं के साँप की,इक न इक हमदर्द भी हर आदमी के साथ है| रईस रामपुरी
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हम किसी के साथ हैं!
क्या कहें ये जब्र कैसा ज़िंदगी के साथ है,हम किसी के साथ हैं और दिल किसी के साथ है| रईस रामपुरी
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दीवारों से मिलकर रोना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में क़ैसर उल ज़ाफरी जी की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे पंकज उधास जी ने गाया था- दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है, हम भी पागल हो जाएंगे, ऐसा लगता है। प्रस्तुत है यह वीडिओ- आशा है आपको यह पसंद आएगाधन्यवाद।
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थी ख़ता उनकी मगर!
थी ख़ता उन की मगर जब आ गए वो सामने,झुक गईं मेरी ही आँखें रस्म-ए-उल्फ़त देखिए| जोश मलीहाबादी
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वाह क्या अशआर हैं!
रश्हा-ए-शबनम बहार-ए-गुल फ़रोग़-ए-मेहर-ओ-माह,वाह क्या अशआर हैं दीवान-ए-फ़ितरत देखिए| जोश मलीहाबादी