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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Nov 2025

    अगर तुम शाद रहना!

    अगर तुम शाद रहना चाहते हो,किसी की भी दिल-आज़ारी न करना| रईस रामपुरी

  • 8th Nov 2025

    आखिरी सौदा- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 7th Nov 2025

    ख़ुद अपनी ज़िल्लत!

    ख़ुद अपनी ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी न करना, किसी कम-ज़र्फ़ से यारी न करना| रईस रामपुरी

  • 7th Nov 2025

    अब जो मेरे साथ है!

    हो चुकी हैं मुश्किलात-ए-राह सब पर आश्कार,अब जो मेरे साथ है अपनी ख़ुशी के साथ| रईस रामपुरी

  • 7th Nov 2025

    कोई किसी के साथ है!

    अपनी अपनी मस्लहत है अपना अपना है मफ़ाद,वर्ना इस दुनिया में कब कोई किसी के साथ है| रईस रामपुरी

  • 7th Nov 2025

    इक न इक हमदर्द!

    ज़िंदा रखने की रिवायत आस्तीं के साँप की,इक न इक हमदर्द भी हर आदमी के साथ है| रईस रामपुरी

  • 7th Nov 2025

    हम किसी के साथ हैं!

    क्या कहें ये जब्र कैसा ज़िंदगी के साथ है,हम किसी के साथ हैं और दिल किसी के साथ है| रईस रामपुरी

  • 7th Nov 2025

    दीवारों से मिलकर रोना!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में क़ैसर उल ज़ाफरी जी की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे पंकज उधास जी ने गाया था- दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है, हम भी पागल हो जाएंगे, ऐसा लगता है। प्रस्तुत है यह वीडिओ- आशा है आपको यह पसंद आएगाधन्यवाद।

  • 7th Nov 2025

    थी ख़ता उनकी मगर!

    थी ख़ता उन की मगर जब आ गए वो सामने,झुक गईं मेरी ही आँखें रस्म-ए-उल्फ़त देखिए| जोश मलीहाबादी

  • 7th Nov 2025

    वाह क्या अशआर हैं!

    रश्हा-ए-शबनम बहार-ए-गुल फ़रोग़-ए-मेहर-ओ-माह,वाह क्या अशआर हैं दीवान-ए-फ़ितरत देखिए| जोश मलीहाबादी

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