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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Sep 2025

    मन है भारी!

    आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- मन है भारी आज सुबह सेये दुश्वारी आज सुबह से। कितने जतन किए बचने केघोड़ों की लगाम कसने के, जितना रोके, उतना भागेमन के अश्व नहीं रुकने के, विचलन मन के हो जाते हैंयहाँ कभी भी किसी वजह से। भागे वहाँ, जिधर कुछ पाएनिर्मोही हम…

  • 6th Sep 2025

    घर से बाहर वही!

    जिन के अंदर चराग़ जलते हैं, घर से बाहर वही निकलते हैं| सूर्यभानु गुप्त

  • 6th Sep 2025

    टूटे हुए पतवार हैं !

    टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो हम क्या,हारी हुई बाहों को ही पतवार बना दे| साहिर लुधियानवी

  • 6th Sep 2025

    क्या ख़ाक वो जीना है!

    क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो,ख़ुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले| साहिर लुधियानवी

  • 6th Sep 2025

    इंसाफ़ तिरे साथ है!

    डरता है ज़माने की निगाहों से भला क्यों,इंसाफ़ तिरे साथ है इल्ज़ाम उठा ले| साहिर लुधियानवी

  • 6th Sep 2025

    तिरे ख़यालों से दूर जा के!

    न सोचने पर भी सोचती हूँ कि ज़िंदगानी में क्या रहेगा,तिरी तमन्ना को दफ़्न कर के तिरे ख़यालों से दूर जा के| साहिर लुधियानवी

  • 6th Sep 2025

    कभी मिलेंगे जो रास्ते में!

    कभी मिलेंगे जो रास्ते में तो मुँह फिरा कर पलट पड़ेंगे,कहीं सुनेंगे जो नाम तेरा तो चुप रहेंगे नज़र झुका के| साहिर लुधियानवी

  • 6th Sep 2025

    न दिल को मालूम है!

    तुझे भुला देंगे अपने दिल से ये फ़ैसला तो किया है लेकिन,न दिल को मालूम है न हम को जिएँगे कैसे तुझे भुला के| साहिर लुधियानवी

  • 6th Sep 2025

    उमीद की बस्तियाँ!

    बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दिए जला के,मिरी वफ़ा ने उजाड़ दी हैं उमीद की बस्तियाँ बसा के| साहिर लुधियानवी

  • 6th Sep 2025

    जमुन-जल मेघ!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत- लौट आए हैं जमुन-जल मेघसिन्धु की अंतर्कथा लेकर । यों फले हैं टूटकर जामुनझुक गई आकाश की…

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