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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Mar 2018

    Wander Thirst by Gerald Gould- Poem translation!

    भ्रमण, यायावरी और यदि धार्मिक उद्देश्य जोड़ दें तो यह पवित्र होकर तीर्थ यात्रा बन जाता है। जी हाँ, आज गेराल्ड गॉल्ड की अंग्रेजी कविता याद आ रही है, जो मुझे बचपन से ही बहुत प्रिय रही है। आज मैं यहाँ उसका यथासंभव हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करने का भी प्रयास कर रहा हूँ- भ्रमण पिपासा…

  • 22nd Mar 2018

    171. भ्रमण पिपासा

    भ्रमण, यायावरी और यदि धार्मिक उद्देश्य जोड़ दें तो यह पवित्र होकर तीर्थ यात्रा बन जाता है। जी हाँ, आज गेराल्ड गॉल्ड की अंग्रेजी कविता याद आ रही है, जो मुझे बचपन से ही बहुत प्रिय रही है। आज मैं यहाँ उसका यथासंभव हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करने का भी प्रयास कर रहा हूँ- भ्रमण पिपासा…

  • 22nd Mar 2018

    171. Translation of Poem by Gerald Gould

    भ्रमण, यायावरी और यदि धार्मिक उद्देश्य जोड़ दें तो यह पवित्र होकर तीर्थ यात्रा बन जाता है। जी हाँ, आज गेराल्ड गॉल्ड की अंग्रेजी कविता याद आ रही है, जो मुझे बचपन से ही बहुत प्रिय रही है। आज मैं यहाँ उसका यथासंभव हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करने का भी प्रयास कर रहा हूँ- भ्रमण पिपासा…

  • 21st Mar 2018

    40. मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा!

    यादों के समुंदर में एक और डुबकी , लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! पता नहीं क्या सोचकर यह ब्लॉग लिखने की शुरुआत की थी। और इसको शेयर करता हूँ ट्विटर पर, फेसबुक पर! जैसे गब्बर सिंह ने सवाल पूछा था, क्या सोचा था सरदार बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा! यहाँ पर सरदार कौन…

  • 20th Mar 2018

    170. जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा!

    आज सईद राही जी की लिखी गज़ल याद आ रही है, जिसे जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने गाकर एक नया आयाम प्रदान कर दिया। इस गज़ल में कुल मिलाकर प्रेम की, इश्क़ की ताक़त, उसके जुनून के बारे में बताया गया है। वास्तव में जब कोई इंसान प्रेम में डूब जाता है, वैसे यहाँ…

  • 19th Mar 2018

    39. पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही!

    चलिए आज फिर से यादों की पुरानी संदूकची खोलते हैं, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ। एक घटना जो याद आ रही है, वह है लखनऊ के पिकप प्रेक्षागृह में आयोजित कवि…

  • 18th Mar 2018

    38. यह पूजन अपनी संस्कृति का, ये अर्चन अपनी भाषा का।

    पुरानी स्मृतियां खंगालने के क्रम में, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! अभी तक मैं वर्षों के हिसाब से बात कर रहा था, जो घटना पहली हुई वह पहले और जो बाद में हुई वह बाद में। पिछले ब्लॉग में, मैं काफी पीछे चला गया था। वैसे मैंने लखनऊ पहुंचने तक की बात की…

  • 17th Mar 2018

    169. वहीँ खाक़ अपनी उड़ाने चला हूँ।!

    चंद तस्वीर-ए-बुतां , चंद हसीनों के खुतूत ! बाद मरने के मेरे घर से ये सामान निकला !! आज चचा ग़ालिब का ये शेर याद आया, तो ये खयाल आया कि कैसे-कैसे लोग होते थे, बल्कि आज भी होते हैं, जो इतने भर से गुज़ारा कर लेते हैं। लेकिन अपना साज़-ओ-सामान समेटते-समेटते हमारा ध्यान उस…

  • 16th Mar 2018

    168. जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

    आज स्व. रामावतार त्यागी जी का एक गीत याद आ रहा है, जो स्वाभिमान की सशक्त अभिव्यक्ति है, यह भाव है इसमें कि मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में निराश नहीं होना चाहिए, अपितु अपने स्वाभिमान, पुरुषार्थ और आस्था के साथ आगे बढ़ना चाहिए। एक भी आँसू न कर बेकार जाने कब समंदर मांगने आ…

  • 15th Mar 2018

    37. हम सदा जिए झुककर सामने हवाओं के!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! मेरे न चाहते हुए भी, एनटीपीसी में आने के बाद की मेरी कहानी मुख्य रूप से कुछ नकारात्मक चरित्रों पर केंद्रित होकर रह गई है। वैसे मेरे जीवन में इन व्यक्तियों का बिल्कुल महत्व नहीं है। मैं बस कुछ प्रवृत्तियों को रेखांकित…

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