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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Mar 2018

    164. बुला गई राधा प्यारी

    होली के पावन अवसर पर मैं, सभी को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ, स्व. अल्हड़ बीकानेरी जी कि  लिखी इस आधुनिक रसिया के साथ- कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुला गई राधा प्यारी।  असली माखन कहाँ मिलैगो, शॉर्टेज है भारी,  चर्बी वारौ बटर मिलैगो, फ्रिज में हे बनवारी,  आधी चम्मच मुख लिपटाय जइयो,  बुला गई राधा प्यारी। …

  • 1st Mar 2018

    163. राजभाषा हिंदी की ट्रैडमिल

    फिटनेस मेंटेन करने के लिए एक बहुत प्रभावी यंत्र बनाया गया, जो आजकल लोग ‘जिम’ में या कुछ संपन्न लोग अपने घरों में भी इस्तेमाल करते हैं। इस यंत्र में जिस पट्टे पर आप चल रहे हैं, वह पीछे खिसकता जाता है, जैसे आपके पांवों के नीचे से जमीन खिसकती जा रही हो और आप…

  • 28th Feb 2018

    29. एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! बीच के एक-दो ब्लॉग्स में कुछ छोटे लोगों का ज़िक्र हो गया था, मैं उनको दोहराकर उन लोगों को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहता। अब विंध्याचल परियोजना के क्लबों का ज़िक्र कर लेते हैं। दो क्लब थे वहाँ पर, वीवा क्लब (विंध्याचल…

  • 27th Feb 2018

    25. अखबारों में, सेमीनारों में, जीता है आम आदमी!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! जैसा कि मैंने बताया, अब बारी थी मेरे सेवाकाल के अंतिम नियोजक, एनटीपीसी लिमिटेड के साथ जुड़ने की, जहाँ मेरी सेवा भी सबसे लंबी रही। 21 मार्च, 1988 को मैंने एनटीपीसी की विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण किया, यहाँ मुझे सांस्कृतिक गतिविधियों के…

  • 26th Feb 2018

    24. और चुकने के लिए हैं, ऋण बहुत सारे!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! अब बारी थी, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की ही एक इकाई, खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में कुछ समय प्रवास की, जयपुर के बाद एक बार फिर से राजस्थान में रहने का अवसर मिला था। राजस्थान के लोग बहुत प्रेम करने वाले हैं। लेकिन यह…

  • 25th Feb 2018

    23. चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग! मुसाबनी प्रवास के दौरान मेरे 2-3 पड़ौसियों की बात कर लेते हैं, एक पांडे जी थे, बनारस के और सिविल विभाग में काम करते थे, उनके साथ मिलकर मैं खैनी खाया करता था। एक और पांडे जी थे, वो रांची के थे, दाढ़ी रखते…

  • 23rd Feb 2018

    162. ठेले पर हिमालय

    डॉ. धर्मवीर भारती की रचना का शीर्षक याद आ गया, जो उन्होंने इलाहाबाद में ठेले पर अमरूद का ऊंचा पहाड़ बनाकार बेचने वालों को ध्यान में रखकर लिखा था। दरअसल मैं मुहल्लों को याद कर रहा था, पुराने ज़माने के, जब हमारा बचपन था! सुबह-सुबह मुहल्ले में कुछ आवाजें आनी शुरू हो जाती थीं। कोई…

  • 22nd Feb 2018

    161. नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है!

    आज जगजीत सिंह जी की गाई एक बहुत सुंदर गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसके लेखक हैं- हस्ती जी। वैसे देखा जाए तो यह गज़ल आज की नहीं लगती, दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है, कौन ख़त लिखता है आज की तारीख में! जब तलाक भी एसएमएस पर हो जाते हैं। खैर यहाँ ख़त…

  • 21st Feb 2018

    160. हरापन नहीं टूटेगा

    आज  स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर करने का मन हो रहा है, रंजक  जी नवगीत आंदोलन के एक महत्वपूर्ण रचनाकार थे। जो रचना शेयर कर रहा हूँ, इसी शीर्षक से उनका एक प्रारंभिक संकलन भी प्रकाशित हुआ था। इस गीत में उन्होंने आशावाद  और जुझारूपन की भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत…

  • 20th Feb 2018

    22. बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग! हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का मऊभंडार में कारखाना था, जहाँ मेरा साक्षात्कार एवं चयन हुआ था, बड़े अधिकारी यहाँ बैठते थे। हमारे वरिष्ठ प्रबंधक- राजभाषा श्री गुप्ता जी भी यहाँ बैठते थे, वैसे वो अपना उपनाम ‘गुप्त’ ही लिखते थे और कहते थे कि गुप्ता…

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