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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Oct 2025

    हमारी उम्र खिलौनों!

    नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की,हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

  • 2nd Oct 2025

    झूम रहीं बालियां!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। चक्रधर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।फल और फूलों से,पटरी के झूलों…

  • 1st Oct 2025

    तमाम शहर में !

    तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही,कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

  • 1st Oct 2025

    तमाम गर्द किताबों में !

    तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं,तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

  • 1st Oct 2025

    वो फ़ाख़्ता जो मुझे!

    वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी,बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

  • 1st Oct 2025

    जगा रहा है ज़माना!

    जगा रहा है ज़माना मगर नहीं खुलतीं,कहाँ की नींद इन आँखों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

  • 1st Oct 2025

    ज़िंदगी आज की एक अंधा कुआं!

    आज प्रस्तुत है , यू ट्यूब पर मेरे स्वर में मेरा एक और गीत- https://youtu.be/_X3SmJtAew4?si=c UTMWVZHUKP-n3n4 ज़िंदगी आज की एक अंधा कुआंआप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा।

  • 1st Oct 2025

    अजीब मैना है!

    अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई,अजीब मैना है शिकरों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना

  • 1st Oct 2025

    जन्नत पुकारती है!

    जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तिरे लिए,दुनिया ब-ज़िद है मुझ से कि जन्नत करो मुझे| मुनव्वर राना

  • 1st Oct 2025

    कब तक रहें देखते एल्बम!

    आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कब तक रहें देखते एल्बम! बदल गया, कुछ बदल रहा हैअब पहले सा कुछ न रहा है,केवल हल्की सी छाया हैसब कुछ पल-पल छीज रहा है। हम अब भी मन में पाले हैंपहले सा होने का मतिभ्रम। सभी देखते बारी-बारीसमय बली की मीनाकारीजीवित हैं हाँ…

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