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पत्तों की तरह बे-दर्द!
छूटे न कभी फूलों का नगर कोशिश तो यही है अपनी मगर,इक रोज़ उड़ा ले जाएगी पत्तों की तरह बे-दर्द हवा| क़ैसर शमीम
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भाषा वंदना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में श्री सोम ठाकुर जी का प्रसिद्ध गीत ‘भाषा वंदना’ प्रस्तुत कर रहा हूँ- ‘करते हैं तन-मन से वंदन जन, गण, मन की अभिलाषा का अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधन अपनी भाषा का’ आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद ।
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कहाँ की गर्द हवा!
सब अपने शनासा छोड़ गए रस्ते में हमें ग़ैरों की तरह,चेहरे पे हमारे डाल गई ला कर ये कहाँ की गर्द हवा| क़ैसर शमीम
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जितना नूतन प्यार तुम्हारा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री सुश्री स्नेहलता स्नेह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री स्नेहलता स्नेह जी का यह गीत- जितना नूतन प्यार तुम्हाराउतनी मेरी व्यथा पुरानीएक साथ कैसे निभ पायेसूना द्वार और अगवानी। तुमने जितनी संज्ञाओं सेमेरा नामकरण कर…
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मौसम तो बदलते हैं!
मौसम तो बदलते हैं लेकिन क्या गर्म हवा क्या सर्द हवा,ऐ दोस्त हमारे आँगन में रहती है हमेशा ज़र्द हवा| क़ैसर शमीम
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जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में मुकेश जी का गाया यह अत्यंत लोकप्रिय गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगेतुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद ।