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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Dec 2019

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-4 : सन्नाटा शहर में!

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौथा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी…

  • 9th Dec 2019

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-3, ‘हम शंटिंग ट्रेन हो गए’!

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज तीसरा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी…

  • 8th Dec 2019

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-2

    कल से मैंने अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध यहाँ शेयर करना शुरू किया है जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं केवल इतना कर रहा हूँ कि मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर…

  • 7th Dec 2019

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-1

    जैसा मैंने कल लिखा था, चाहता हूँ कि अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध हैं, और याद आ रही हैं, एक बार यहाँ शेयर कर लूं, जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। वैसे तो मेरा संपादकों से, कविता के संप्रभुओं से कभी कोई निकट का नाता नहीं रहा।…

  • 6th Dec 2019

    कविता का मायाजाल!

    एक समय था जब दिल्ली-शाहदरा में रहते हुए मैंने बहुत सी कवितायें, नवगीत आदि लिखे थे। मेरा जन्म 1950 में हुआ था दरियागंज, दिल्ली में लेकिन पढ़ाई शाहदरा में जाने के बाद ही शुरू हुई और 1980 तक, अथवा 30 वर्ष की आयु तक मैं शाहदरा में ही रहा। इस बीच शुरू की नौकरियां कीं,…

  • 5th Dec 2019

    रेल चली तो बैठी हुई थी, मेरे बराबर तन्हाई!

    आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ- पिछला ब्लॉग लिखने का जब खयाल आया था, तब मन में एक छवि थी, बाद में लिखता गया और वह मूल छवि जिससे लिखने का सोचा था भूल ही गया, तन्हाई का यही तो मूल भाव है कि लोग अचानक भूल जाते हैं। वह…

  • 4th Dec 2019

    तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे!

    आज ज़नाब नज़ीर बाक़री जी की लिखी हुई एक गज़ल याद आ रही है, जिसे जगजीत सिंह जी ने अपनी मधुर आवाज में गाकर अमर कर दिया।     इस गज़ल को सुनते हुए यही खयाल आता है कि कैसे अजीब प्राणी होते हैं ये कवि-शायर भी, ज़ुर्म भी क़ुबूल करेंगे और सज़ा भी अपनी…

  • 3rd Dec 2019

    Social media v/s Society!

    Today once again I am talking about Social media. While thinking about social media, the first objection that rises in my mind is, how come it is called ‘Social’! Actually it is the thing that has destroyed all social connections in today’s world.   I remember the scene of Chaupals in villages, mostly we have…

  • 2nd Dec 2019

    उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है!

    आज ज़नाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ जी की एक खूबसूरत सी गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है। ‘नूर’ साहब उर्दू अदब के जाने-माने शायर थे, इस गज़ल में कुछ बेहतरीन फीलिंग्स और जीवन का फल्सफा भी है। वैसे इस गज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया भी है, इसलिए कभी तो आपने इसको सुना…

  • 1st Dec 2019

    सबसे पहले चमेली पुष्प – रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

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