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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Feb 2022

    काई है अब मकानों पर!

    ऐसी काई है अब मकानों पर,धूप के पाँव भी फिसलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    तब कहीं रास्ते पिघलते हैं!

    दिन पहाड़ों की तरह कटते हैं,तब कहीं रास्ते पिघलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    धूप के कारोबार चलते हैं!

    बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में,धूप के कारोबार चलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    बाहर वही निकलते हैं!

    जिनके अंदर चिराग़ जलते हैं,घर से बाहर वही निकलते हैं। सूर्यभानु गुप्त

  • 17th Feb 2022

    उठ मेरी बेटी सुबह हो गई!

    लीजिए आज एक बार फिर से स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता प्रस्तुत है| जैसा कि मैंने पहले भी उनके बारे में लिखा है वे साप्ताहिक समाचार पत्रिका- ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में थे और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि थे| कुछ कविताओं में उनकी अभिव्यक्ति वास्तव में अद्वितीय रही है| आज की कविता…

  • 16th Feb 2022

    पहचाना सा लगे है मुझे!

    मैं सोचता था कि लौटूंगा अजनबी की तरह,ये मेरा गांव तो पहचाना सा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर

  • 16th Feb 2022

    उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ!

    मैं जब भी उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ,वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर

  • 16th Feb 2022

    कोई झांकता लगे है मुझे!

    मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आंखों में,तमाम रात कोई झांकता लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर

  • 16th Feb 2022

    वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे!

    जो आंसुओं में कभी रात भीग जाती है,बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर

  • 16th Feb 2022

    कोई बद-दुआ लगे है मुझे!

    हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे,ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर

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