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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th Feb 2022

    यादों के लम्हात बरतता हूँ !

    कंजूस कोई जैसे गिनता रहे सिक्कों को,ऐसे ही मैं यादों के लम्हात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी

  • 20th Feb 2022

    अपने हालात बरतता हूँ!

    खुलते भी भला कैसे आँसू मेरे औरों पर,हँस-हँस के जो मैं अपने हालात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी

  • 20th Feb 2022

    बनकर सुक़रात, बरतता हूँ!

    इक ज़हर के दरिया को दिन-रात बरतता हूँ ।हर साँस को मैं, बनकर सुक़रात, बरतता हूँ । राजेश रेड्डी

  • 20th Feb 2022

    क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है !

    मेरे अत्यंत प्रिय रहे सृजनधर्मी नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| रमेश रंजक जी ने वास्तव में नवगीत विधा में नई ऊँचाइयाँ हासिल की थीं और उनसे हमेशा चमत्कारिक अभिव्यक्ति की उम्मीद बनी रहती थी| काव्यधर्म का वे हमेशा कड़ाई से पालन करते थे और उन्होंने अनेक…

  • 19th Feb 2022

    इस्मत बचा ले गई!

    मेरी शोहरत सियासत से महफ़ूज़ है,ये तवायफ़ भी इस्मत बचा ले गई| बशीर बद्र

  • 19th Feb 2022

    रात मुझको जगा कर कहा!

    चांद ने रात मुझको जगा कर कहा,एक लड़की तुम्हारा पता ले गई| बशीर बद्र

  • 19th Feb 2022

    काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुए!

    हम जो काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुए,क्यों चिराग़ों की लौ तक हवा ले गई| बशीर बद्र

  • 19th Feb 2022

    मौज आई बहा ले गई!

    मैं समुंदर के सीने में चट्टान था,रात एक मौज आई बहा ले गई| बशीर बद्र

  • 19th Feb 2022

    मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं!

    मेरी मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं,ख़ुशबुओं को उड़ाकर हवा ले गई| बशीर बद्र

  • 19th Feb 2022

    हम फ़क़ीरों से क्या ले गई!

    सर से चादर बदन से क़बा ले गई,ज़िन्दगी हम फ़क़ीरों से क्या ले गई| बशीर बद्र

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