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यादों के लम्हात बरतता हूँ !
कंजूस कोई जैसे गिनता रहे सिक्कों को,ऐसे ही मैं यादों के लम्हात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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अपने हालात बरतता हूँ!
खुलते भी भला कैसे आँसू मेरे औरों पर,हँस-हँस के जो मैं अपने हालात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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बनकर सुक़रात, बरतता हूँ!
इक ज़हर के दरिया को दिन-रात बरतता हूँ ।हर साँस को मैं, बनकर सुक़रात, बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है !
मेरे अत्यंत प्रिय रहे सृजनधर्मी नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| रमेश रंजक जी ने वास्तव में नवगीत विधा में नई ऊँचाइयाँ हासिल की थीं और उनसे हमेशा चमत्कारिक अभिव्यक्ति की उम्मीद बनी रहती थी| काव्यधर्म का वे हमेशा कड़ाई से पालन करते थे और उन्होंने अनेक…
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काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुए!
हम जो काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुए,क्यों चिराग़ों की लौ तक हवा ले गई| बशीर बद्र
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मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं!
मेरी मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं,ख़ुशबुओं को उड़ाकर हवा ले गई| बशीर बद्र
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हम फ़क़ीरों से क्या ले गई!
सर से चादर बदन से क़बा ले गई,ज़िन्दगी हम फ़क़ीरों से क्या ले गई| बशीर बद्र