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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th May 2022

    फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता!

    हमारी आँख के आँसू की अपनी दुनिया है,किसी फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    सदाओं का घर नहीं होता!

    मुझे तलाश करोगे तो फिर न पाओगे,मैं इक सदा हूँ सदाओं का घर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    ख़ाक में मिलने का डर नहीं होता!

    मैं उसकी आँख का आँसू न बन सका वर्ना,मुझे भी ख़ाक में मिलने का डर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    बातों से सर नहीं होता!

    कभी लहू से भी तारीख़ लिखनी पड़ती है,हर एक मारका बातों से सर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    मुक़द्दर में घर नहीं होता!

    सभी का धूप से बचने को सर नहीं होता,हर आदमी के मुक़द्दर में घर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    ख़ता हो, उसी को सज़ा मिले!

    इस दौर ए मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं ‘वसीम,जिस शख्स की ख़ता हो, उसी को सज़ा मिले|‘ वसीम बरेलवी

  • 12th May 2022

    कुछ सूखे फूलों के गुलदस्ते!

    स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी अपनी किस्म के अनूठे कवि थे| बातचीत के लहज़े में कविता कहने का उनका निराला अंदाज़ था| मैंने पहले भी भवानी दादा की कुछ कविताएं शेयर की हैं|लीजिए आज प्रस्तुत है, हमारे भवानी दादा की यह कविता, जिसमें अभिव्यक्ति का एक अनूठा उदाहरण मिलता है – कुछ सूखे फूलों केगुलदस्तों…

  • 11th May 2022

    कोई बेवफ़ा मिले!

    रिश्तों को बार बार समझने की आरज़ू,कहती है फिर मिले तो कोई बेवफ़ा मिले। वसीम बरेलवी

  • 11th May 2022

    किताबों में क्या मिले!

    दुनिया को दूसरों की नज़र से न देखिये,चेहरे न पढ़ सके तो किताबों में क्या मिले| वसीम बरेलवी

  • 11th May 2022

    हमारी तरफ देखता मिले!

    इस आरज़ू ने और तमाशा बना दिया,जो भी मिले हमारी तरफ देखता मिले| वसीम बरेलवी

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