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बुझाई नहीं जाने वाली!
कितना अच्छा है कि साँसों की हवा लगती है,आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली| दुष्यंत कुमार
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ख़तरनाक सच्चाई नहीं जाने वाली!
देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली,ये ख़तरनाक सच्चाई नहीं जाने वाली| दुष्यंत कुमार
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कलम सरकंडे की!
श्री रामदरश मिश्र जी हिन्दी के उन श्रेष्ठ श्रेष्ठ रचनाकारों में से एक हैं, जिन्होंने कविता, कहानी और उपन्यास सभी क्षेत्रों में अपनी रचनाओं के माध्यम से उल्लेखनीय योगदान किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता जो कविधर्म की ओर बड़े सधे और शालीन ढंग से स्पष्ट संकेत करती…
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आकाश-सी छाती तो है!
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है| दुष्यंत कुमार
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जा के बतियाती तो है!
निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है| दुष्यंत कुमार
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उस भोर तक जाती तो है!
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है| दुष्यंत कुमार
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गूँगी ही सही, गाती तो है!
एक खँडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी,आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है| दुष्यंत कुमार
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भीगी हुई बाती तो है!
एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो,इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है| दुष्यंत कुमार
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लहरों से टकराती तो है!
इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है| दुष्यंत कुमार
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इतने बरसों बाद!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| लंबे समय तक बरसात को तरसने के बाद जब गाँव देहात में बारिश होती है तो सबके मन को सरसा जाती है, कृषक परिवारों के मन में एक नया उल्लास आ जाता है| यह गीत…