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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th May 2022

    लचकना छोड़ दिया!

    पिंजरे की सम्त चले पंछी,शाख़ों ने लचकना छोड़ दिया| बेकल उत्साही

  • 17th May 2022

    महकना छोड़ दिया!

    पोशाक बहारों ने बदली,फूलों ने महकना छोड़ दिया| बेकल उत्साही

  • 17th May 2022

    दिल ने तड़पना छोड़ दिया!

    जब दिल ने तड़पना छोड़ दिया,जलवों ने मचलना छोड़ दिया| बेकल उत्साही

  • 17th May 2022

    नींद भी मेरे नयन की!

    एक बार फिर मैं हिन्दी के सुरीले गीतकार, जिनको हम गीतों के राजकुंवर भी कहते हैं और जिन्होंने हिन्दी काव्य मंचों, काव्य साहित्य और हिन्दी फिल्मों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है, ऐसे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत भी उन गीतों में शामिल है जिनको शायद…

  • 16th May 2022

    नहीं कोई मकाँ मेरा!

    मैं जब लौटा तो कोई और ही आबाद था “बेकल”,मैं इक रमता हुआ जोगी, नहीं कोई मकाँ मेरा| बेकल उत्साही

  • 16th May 2022

    यही जन्नत निशाँ मेरा!

    कहीं बारूद फूलों में, कहीं शोले शिगूफ़ों में,ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे, है यही जन्नत निशाँ मेरा| बेकल उत्साही

  • 16th May 2022

    ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा!

    पड़ेगा वक़्त जब मेरी दुआएँ काम आएंगी,अभी कुछ तल्ख़ लगता है ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा| बेकल उत्साही

  • 16th May 2022

    गुबारे-कारवाँ मेरा!

    बचाकर रख उसे मंज़िल से पहले रूठने वाले,तुझे रस्ता दिखाएगा गुबारे-कारवाँ मेरा| बेकल उत्साही

  • 16th May 2022

    तुम जला दो आशियाँ मेरा!

    सुकूँ पाएँ चमन वाले हर इक घर रोशनी पहुँचे,मुझे अच्छा लगेगा तुम जला दो आशियाँ मेरा| बेकल उत्साही

  • 16th May 2022

    कुछ नहीं पूछा -रवीन्द्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है| प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया…

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